टोंक/जयपुर। राजस्थान की सियासत हो या प्रशासन, इन दिनों टोंक जिले की चर्चा हर तरफ हो रही है। एक तरफ वो जिला है जिसकी कमान अब कलेक्टर टीना डाबी के हाथों में है, तो दूसरी तरफ नरेश मीणा का वो ‘घर’ है जहां उन्होंने अपना दिल बसाया है। हाल ही में टोंक जिला मुख्यालय पर प्रशासन का एक ऐसा रूप देखने को मिला, जिसकी कल्पना शायद वहां मौजूद अधिकारियों ने भी नहीं की थी।
मैराथन जनसुनवाई: 7 घंटे तक नहीं छोड़ी कुर्सी
मुख्यमंत्री के सख्त निर्देशों के बाद कलेक्टर टीना डाबी पूरी तरह एक्शन मोड में नजर आईं। जिला मुख्यालय पर आयोजित जनसुनवाई में घड़ी की सुइयां चलती रहीं, लेकिन कलेक्टर की कुर्सी खाली नहीं हुई। पूरे 7 घंटे तक बिना किसी चाय या लंच ब्रेक के, टीना डाबी ने एक-एक फरियादी की समस्या सुनी।
टीना डाबी ने लापरवाह अधिकारियों को दो-टूक लहजे में चेतावनी देते हुए कहा, ‘अगर कोई फरियादी 100 किलोमीटर दूर से यहाँ आ रहा है, तो इसका मतलब है कि निचले स्तर के अधिकारियों ने अपना काम ईमानदारी से नहीं किया।’
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‘ऑन द स्पॉट’ एक्शन से अफसरों के छूटे पसीने
जनसुनवाई के दौरान कलेक्टर ने केवल कागजी खानापूर्ति नहीं की, बल्कि कई गंभीर मामलों में अधिकारियों को तुरंत मौके पर जाकर रिपोर्ट देने का फरमान सुना दिया। भरी सभा में कलेक्टर के इस कड़े तेवर को देखकर कई अधिकारियों के पसीने छूट गए। टीना डाबी का संदेश साफ है-समाधान केवल रजिस्टर में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखना चाहिए।
नरेश मीणा का ‘एहसान’ और टोंक से जुड़ाव
टोंक की इस प्रशासनिक सक्रियता के बीच नरेश मीणा का जिक्र होना लाजमी है। देवली-उनियारा उपचुनाव के दौरान टोंक की जनता ने नरेश मीणा पर जो प्यार और विश्वास बरसाया, उसने उन्हें जनता का कर्जदार बना दिया है।
नरेश मीणा अक्सर कहते हैं कि वे टोंक की जनता के उस एहसान का बदला विकास और उनके हक की आवाज उठाकर चुकाना चाहते हैं। टोंक की गलियों में यह चर्चा आम है कि प्रशासन पर यह दबाव कहीं न कहीं उन जन-नेताओं की सक्रियता का भी नतीजा है, जो जनता की समस्याओं पर मुखर रहते हैं। जनता का मानना है कि एक तरफ टीना डाबी जैसा सख्त प्रशासन और दूसरी तरफ नरेश मीणा जैसा निडर पहरेदार हो, तो जिले का भला होना निश्चित है।
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गौ-अभयारण्य और विकास का खाका
जनसुनवाई में न केवल व्यक्तिगत शिकायतें सुनी गईं, बल्कि जिले के विकास पर भी चर्चा हुई। गौ-अभयारण्य बनाने की मांग पर कलेक्टर ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए भरोसा दिलाया कि चरागाह भूमि पर टीन शेड, ट्यूबवेल और अनुदान के जरिए गौ-वंश का संरक्षण किया जाएगा। साथ ही विधायक मद के पैसों का सदुपयोग करने की रणनीति भी तैयार कर ली गई है।
क्या अब बदलेगा टोंक?
अब सवाल यह है कि क्या फाइलों के बजाय वाकई जमीन पर काम बोलेगा? टीना डाबी का सख्त अंदाज और नरेश मीणा का टोंक प्रेम मिलकर क्या जनता के दुखों का अंत कर पाएगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल प्रशासन के इस नए अवतार ने जनता में एक नई उम्मीद जरूर जगा दी है।



