बाड़मेर/जयपुर। राजस्थान की सियासत के ‘युवा तुर्क’ और शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी की सुरक्षा में अचानक की गई कटौती ने एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। जहाँ एक ओर भाटी पश्चिमी राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत ‘ओरण और गोचर’ की ज़मीन को बचाने के लिए आर-पार की जंग लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार द्वारा उनकी सुरक्षा घटाए जाने को ‘सियासी बदले’ के तौर पर देखा जा रहा है।
ओरण-गोचर की लड़ाई और सरकार का ‘इनाम’?
मामला सीधे तौर पर पश्चिमी राजस्थान की उस पवित्र ज़मीन ‘ओरण’ से जुड़ा है, जो देवी-देवताओं को समर्पित होती है। सौर ऊर्जा कंपनियों के बढ़ते दखल और अतिक्रमण के खिलाफ रविंद्र सिंह भाटी ने जयपुर कूच और सीएम हाउस के घेराव का ऐलान किया है। भाटी का तर्क है कि पर्यावरण और संस्कृति से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगा। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही आंदोलन ने रफ़्तार पकड़ी, सरकार ने भाटी की सुरक्षा की समीक्षा कर उनके कमांडो वापस बुला लिए।
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धमकियों के बीच सुरक्षा में सेंध क्यों?
याद दिला दें कि 2023 में विधायक बनने के बाद भाटी को जान से मारने की धमकियां मिली थीं, जिसके बाद खुफिया तंत्र की रिपोर्ट पर उनकी सुरक्षा बढ़ाकर 4 कमांडो (PSO) की गई थी। अब अचानक अतिरिक्त सुरक्षा हटाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं।
भाटी का खुलासा: रविंद्र सिंह भाटी ने इसे सीधे तौर पर ‘राजनीतिक दबाव’ बताया है। उन्होंने कहा, ‘यह छोटे स्तर की राजनीति है, जो मेरे हौसले नहीं तोड़ सकती। जनता मेरा कवच है।’
‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’
भाटी ने सरकार को दोटूक चेतावनी देते हुए कहा है कि सुरक्षा रहे या न रहे, वे जनता के मुद्दों से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना रुख साफ करते हुए लिखा— ‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’। भाटी के समर्थकों का आरोप है कि सरकार उनकी बढ़ती लोकप्रियता और जन-आंदोलनों से घबराकर ऐसे कदम उठा रही है।
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सियासी गलियारों में चर्चा: क्या सरकार असहज है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ओरण-गोचर का मुद्दा ग्रामीण और पशुपालक समाज की भावनाओं से जुड़ा है। अगर भाटी जयपुर में हज़ारों की भीड़ जुटाने में सफल रहते हैं, तो यह भजनलाल सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे में आंदोलन के ठीक पहले सुरक्षा हटाना ‘प्रशासनिक प्रक्रिया’ कम और ‘राजनीतिक संकेत’ ज्यादा नजर आता है।



