Admiral Dinesh K Tripathi : नई दिल्ली। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने शनिवार को तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल की संयुक्त क्षमताओं को एकीकृत करते हुए विशेष नौसैनिक थिएटर कमान के गठन की मजबूत वकालत की। उन्होंने कहा कि यह कदम केवल संरचनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि देश की युद्ध क्षमता को अधिक प्रभावी और आधुनिक बनाने की दिशा में एक निर्णायक पहल होना चाहिए। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का उल्लेख करते हुए एडमिरल त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि समुद्री सुरक्षा अब केवल सैन्य रणनीति का हिस्सा नहीं रही, बल्कि यह सीधे तौर पर ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ चुकी है। ऐसे में समन्वित और एकीकृत कमांड संरचना की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए विशेष साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि थिएटराइजेशन का उद्देश्य सिर्फ तीनों सेनाओं को एक छत के नीचे लाना नहीं है, बल्कि वास्तविक लक्ष्य युद्ध संचालन को अधिक संगठित, तेज और प्रभावी बनाना है। इससे भारत की समग्र सैन्य शक्ति और प्रतिक्रिया क्षमता में महत्वपूर्ण सुधार होगा।
नौसेना प्रमुख ने कहा कि सेना के तीनों अंगों का तालमेल (संयुक्तता) सिर्फ एक अवधारणा नहीं, बल्कि युद्ध जीतने की एक अनिवार्य जरूरत है। उन्होंने जोर दिया कि जो भी नया ढांचा तैयार किया जाए, उसमें समुद्री चुनौतियों और हकीकतों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए, साथ ही वह देश के साझा युद्ध कौशल के बड़े लक्ष्यों के साथ पूरी तरह मेल खाना चाहिए। पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट को देखते हुए, थलसेना, नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल की परिसंपत्तियों तथा कर्मियों को मिलाकर एक विशिष्ट नौसैनिक थिएटर कमान बनाने की बात पर ध्यान दिया जा रहा है। इस व्यापक रूपरेखा में उत्तरी तथा पश्चिमी मोर्चों के प्रबंधन के लिए दो और थिएटर कमान बनाने की बात कही गई है।

एडमिरल त्रिपाठी ने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और रूस-यूक्रेन संघर्ष ‘‘साफ याद दिलाते हैं’’ कि सुरक्षा का विषय आपस में जुड़ा हुआ है, और संघर्ष से दूरी का मतलब उसके नतीजों से दूरी नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘पहला और सबसे जरूरी सबक यह है कि समुद्री सुरक्षा सीधे आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय लचीलेपन से जुड़ी है।’’ नौसेना प्रमुख ने कहा, ‘‘जहाजरानी मार्गों, ऊर्जा प्रवाह और समुद्री साजो-सामान की कड़ियों में रुकावट के तत्काल रणनीतिक और आर्थिक नतीजे होते हैं, जिससे बीमा की लागत, जहाजरानी पैटर्न और पूरे इलाकों में रणनीतिक संतुलन पर असर पड़ता है।’’ उन्होंने कहा कि युद्ध का तरीका ही बहुत बड़े बदलाव से गुजर रहा है और आज समुद्री युद्धक्षेत्र समुद्र तल से लेकर अंतरिक्ष तक आसानी से फैला हुआ है, जबकि साइबर, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक, सूचना और ज्ञानात्मक क्षेत्र भी उतने ही ज़रूरी हो गए हैं।
त्रिपाठी ने हाल के संघर्षों का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि छोटी और तेज लड़ाइयों का मिथक गलत साबित हो गया है और लंबी दूरी के सटीक हथियारों तथा लगातार निगरानी के जमाने में रणनीतिक गहराई अब किसी ठिकाने की गारंटी नहीं देती। नौसेना प्रमुख ने कहा, ‘‘इसके अलावा देशों के बीच व्यापारिक करों (टैरिफ) को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और सामान पहुंचाने वाली आपस में जुड़ी कड़ियों में रुकावटें आ रही हैं। इस वजह से अब देशों को अपनी रणनीति बदलनी होगी-उन्हें अब सिर्फ ‘समय पर काम चलाने’ वाली तत्परता के बजाय, ‘मुसीबत के लिए तैयार रहने’ वाले जुझारूपन पर ध्यान देना होगा।’’



