सुधार के बिना नहीं सुलझेगी प्रमाण पत्र बनवाने की परेशानी

    ओडिशा के क्योंझर की घटना ने दिखाया कि प्रमाण पत्र बनवाना आज भी आमजन के लिए कठिन है। जटिल प्रक्रियाएं, भ्रष्टाचार, दलालों का दखल और कमजोर डिजिटल व्यवस्था लोगों को परेशान करती है, खासकर ग्रामीण व अशिक्षित वर्ग को। समाधान के लिए सरल प्रक्रियाएं, तय समयसीमा, जवाबदेही, सख्त कार्रवाई और प्रभावी ई-गवर्नेंस जरूरी है, तभी आम लोगों की परेशानी दूर हो सकेगी।

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    डेथ सर्टिफिकेट की अहमियत अब तो सब समझ ही गए होंगे। ओडिशा के क्योंझर में महज उन्नीस हजार के लिए चिलचिलाती धूप में एक भाई तीन किलोमीटर पैदल चला। कांधे पर अपनी बहन का कंकाल लादे। वो कंकाल लेकर बैंक पहुंचा, वो इसलिए कि उसके पास बहन का डेथ सर्टिफिकेट नहीं था। एक अनपढ़ आदिवासी की इस व्यथा को ‘भरपूर’ कवरेज मिला। वीडियो वायरल भी हुआ और पीड़ित जीतू मुंडा की बेबसी बताई गई। बहन की मौत के बाद न बैंक वालों ने इंसानियत दिखाई न ही वह इस प्रमाण-पत्र की महत्ता को समझ पाया। आखिर वो बहन का कंकाल लेकर ही बैंक पहुंच गया ताकि पशुओं को बेचकर जो उसकी बहन ने रकम जमा की थी, उसे निकाल सके। मृत्यु प्रमाण पत्र हो, जन्म प्रमाण पत्र हो या फिर कोई अन्य जरूरी दस्तावेज-इनको बनवाना आज भी आम आदमी के लिए किसी जंग से कम नहीं है। सरकारी दफ्तरों में प्रक्रियाएं इतनी जटिल और उलझी हुई हैं कि पढ़े-लिखे लोग भी कई बार हार मान जाते हैं, फिर अनपढ़ और ग्रामीण जनता की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। ग्रामीण और कम शिक्षित लोग इस पूरे खेल का सबसे आसान शिकार बनते हैं। उन्हें यह तक पता नहीं होता कि कौन सा प्रमाण पत्र कितने समय में और कितनी फीस में बन सकता है। इस अनभिज्ञता का फायदा उठाकर कुछ कर्मचारी और दलाल मिलकर एक समानांतर व्यवस्था खड़ी कर देते हैं, जहां हर काम की एक “कीमत” तय होती है। यह न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि शासन व्यवस्था पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।

    डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस की बात जरूर होती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है। कई जगह ऑनलाइन सिस्टम या तो पूरी तरह लागू नहीं है या फिर इतना जटिल है कि आम व्यक्ति के लिए उसका उपयोग करना मुश्किल हो जाता है। तकनीकी खामियां और सर्वर की दिक्कतें भी लोगों की परेशानी बढ़ाती हैं, जिससे वे फिर से पुराने और भ्रष्ट तरीकों की ओर लौटने को मजबूर हो जाते हैं। हालात ऐसे हैं कि अगर किसी को अलॉटमेंट लेटर या फिर कोई अन्य दस्तावेज लेना हो या किसी सरकारी योजना का लाभ उठाना हो, तो बिना “रास्ता बनाए” काम आगे बढ़ता ही नहीं। यह “रास्ता” अक्सर घूस के रूप में सामने आता है, जिसने व्यवस्था को खोखला कर दिया है। सरकारी दफ्तरों की कार्यप्रणाली अब भी आमजन के अनुकूल नहीं बन पाई है। एक साधारण काम के लिए कई बार चक्कर लगाने पड़ते हैं, हर बार कोई नई कमी बताकर फाइल को अटका दिया जाता है। इस देरी और उलझन से परेशान होकर लोग मजबूरी में दलालों का सहारा लेते हैं, जो दावा करते हैं कि उनका “संपर्क” काम जल्दी करवा देगा-लेकिन इसकी कीमत आम आदमी को अपनी जेब से चुकानी पड़ती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह व्यवस्था अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य बनती जा रही है। लोगों के मन में यह धारणा बैठ गई है कि बिना पैसे दिए कोई काम होना मुश्किल है। यह सोच न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है, बल्कि ईमानदार व्यवस्था की उम्मीद को भी कमजोर करती है। खासकर गरीब और कम पढ़े-लिखे लोग इस चक्र में सबसे ज्यादा पिसते हैं।

    डिजिटल प्रक्रियाओं और ऑनलाइन सेवाओं के दावे जरूर किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में या तो ये सुविधाएं अधूरी हैं या फिर इतनी जटिल हैं कि आम व्यक्ति के लिए उनका उपयोग करना आसान नहीं। नतीजा यह होता है कि लोग फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं, जहां “सुविधा शुल्क” ही काम करवाने का जरिया बन जाता है। ओडिशा वाले मामले में यह भी साफ हो गया कि मदद कोई नहीं करता, बवाल करने के लिए भीड़ इकट्‌ठा हो जाती है। पीड़ित जीतू की समस्या को आसपास के लोगों ने नहीं समझा। उसे डेथ सर्टिफिकेट बनवाने का सिस्टम नहीं पता था तो उसकी मदद करते। बैंक वाले भी चाहते तो उसे सहजता से इसके लिए रास्ता बता सकते थे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, वो इसलिए भी कि मदद नहीं करना अब परंपरा सी बनती जा रही है। राजस्थान की राजधानी जयपुर ही नहीं अधिकांश जगह के सरकारी विभागों के यही हाल हैं। आपका सहयोग नहीं किया जाता, आपको इंतजार करवाया जाता है। वो तो तब जब आप पढ़े-लिखे हैं। ऐसे में अशिक्षित और ग्रामीणों का सरकारी दफ्तरों में क्या हाल होता होगा, यह किसी से छिपा नहीं है।

    असल समस्या केवल कर्मचारियों की लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की संरचनात्मक खामियों का नतीजा है। प्रक्रियाएं जटिल हैं, जवाबदेही तय नहीं है और निगरानी तंत्र कमजोर है। जब किसी काम के लिए स्पष्ट समयसीमा और जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो फाइलें जानबूझकर रोकी जाती हैं और आम आदमी को थकाकर घूस देने के लिए मजबूर किया जाता है। हर सेवा के लिए तय समयसीमा लागू हो, “राइट टू सर्विस” कानून को सख्ती से लागू किया जाए और हर स्तर पर जवाबदेही तय हो। तकनीक का इस्तेमाल केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के लिए किया जाए। साथ ही, भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारियों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई जरूरी है। जनता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब तक लोग घूस देकर काम करवाने को “आसान रास्ता” मानते रहेंगे, तब तक यह व्यवस्था बदलना मुश्किल होगा। जागरूकता और अधिकारों की समझ ही इस चक्र को तोड़ सकती है।