मरीज परेशान, सिस्टम लाचार-कब बदलेगी तस्वीर

    स्वास्थ्य सेवा में सुधार का रास्ता जिम्मेदारी से होकर ही गुजरता है-न कि उससे बचने से। रेफरल सिस्टम के जरिए कई मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ता है। व्यवस्था सुधरनी चाहिए, अस्पतालों के साथ उपचार के साधन-संसाधन की भी समीक्षा हो। ऐसे डॉक्टर भी चिन्हित हों जो केवल अपने सिर से बोझ हटाने के लिए मरीजों को रेफर कर देते हैं, बिना उनकी जान की परवाह किए बगैर।

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    सरकारी अस्पतालों की संख्या बढ़ी, उनके विस्तार के दावे भी हुए पर इलाज का सिस्टम ज्यों का त्यों बना हुआ है। मामूली हादसे में कोई घायल हो या किसी अन्य बीमारी से ग्रसित व्यक्ति, बड़े अस्पताल में रेफर करना अब सिस्टम सा बन चुका है। मतलब साफ है कि रोग का उपचार दूरदराज ग्रामीण इलाकों में अब भी संभव नहीं है या फिर वहां के डॉक्टर जिम्मेदारी लेने से बच रहे हैं। मरीज को बला समझकर टालने का काम जोरों पर है। और तो और इस सिस्टम में प्राइवेट अस्पताल भी पीछे नहीं हैं। इसका सबसे बड़ा खामियाजा मरीज और उसके परिजनों को भुगतना पड़ता है। समय की बर्बादी, आर्थिक बोझ और मानसिक तनाव। गंभीर हालत में रेफरल की यह कड़ी मरीज की जान पर भी भारी पड़ती है। खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों में, जहां बेहतर सुविधाएं सीमित हैं, वहां यह समस्या और भी विकराल रूप ले लेती है। निजी अस्पतालों में तो कई बार रेफरल के पीछे व्यावसायिक हित भी जुड़े होने के आरोप लगते हैं। अपने नेटवर्क के अस्पतालों में मरीज भेजना, जांच और इलाज के नाम पर खर्च बढ़ाना, यह सब स्वास्थ्य सेवा की साख पर सवाल खड़े कर रहा है। वहीं सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी, डॉक्टरों की कमी और जवाबदेही की कमी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।

    मामूली सी दुर्घटना पर भी मरीज को तुरंत “हायर सेंटर” रेफर कर देना अब एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है। यह केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का आसान तरीका बन गया है। पहले जहां छोटे-मोटे जख्म, फ्रैक्चर या सामान्य चोटों का इलाज स्थानीय अस्पतालों में ही हो जाता था, वहीं अब बिना गंभीरता आंके सीधे बड़े अस्पताल भेज दिया जाता है। न तो प्राथमिक इलाज पूरा किया जाता है और न ही मरीज को स्थिर करने की पूरी कोशिश होती है। परिणाम-मरीज और उसके परिजन एंबुलेंस, दूरी और खर्च के बोझ तले दब जाते हैं। डॉक्टरों का तर्क अक्सर यही होता है कि “सुविधाएं नहीं हैं” या “रिस्क नहीं ले सकते”। यह तर्क कुछ हद तक सही हो सकता है, लेकिन हर मामूली केस में इसका इस्तेमाल करना पेशेवर जिम्मेदारी से बचने जैसा लगता है। इलाज के बजाय “पास ऑन” करने की मानसिकता स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करती है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और उपकरणों की कमी एक सच्चाई है, लेकिन इसका समाधान मरीज को टालना नहीं हो सकता। वहीं निजी अस्पतालों में यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि क्या हर रेफरल वास्तव में जरूरत के आधार पर है या किसी और वजह से?

    प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से जिला अस्पताल, और जिला अस्पताल से बड़े मेडिकल कॉलेज तक मरीजों को इधर-उधर भेजने का यह सिलसिला अब व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। सवाल यह है कि आखिर मरीजों को रेफर करने के पीछे असली कहानी क्या है-जरूरत या मजबूरी, या फिर सिस्टम की खामियां? जरूरत इस बात की है कि रेफरल सिस्टम को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए। हर रेफरल के साथ स्पष्ट कारण दर्ज हो, और यह सुनिश्चित किया जाए कि प्राथमिक इलाज और मरीज को स्थिर करने की प्रक्रिया पूरी हो। साथ ही छोटे और मध्यम स्तर के अस्पतालों को संसाधनों और प्रशिक्षण से मजबूत किया जाए ताकि वे बेसिक मामलों को संभाल सकें। डॉक्टर का पेशा केवल इलाज नहीं, बल्कि भरोसा भी है। अगर मामूली मामलों में भी जिम्मेदारी लेने से बचा जाएगा, तो यह भरोसा धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। स्वास्थ्य सेवा में सुधार का रास्ता जिम्मेदारी से होकर ही गुजरता है-न कि उससे बचने से। यह भी सब जानते हैं कि इस रेफरल सिस्टम के जरिए कई मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ता है। व्यवस्था सुधरनी चाहिए, अस्पतालों के साथ उपचार के साधन-संसाधन की भी समीक्षा हो। ऐसे डॉक्टर भी चिन्हित हों जो केवल अपने सिर से बोझ हटाने के लिए मरीजों को रेफर कर देते हैं, बिना उनकी जान की परवाह किए बगैर।

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