पानी के संकट पर मचे बवाल के बाद भाजपा विधायक जयदीप बिहाणी को पीट दिया गया। यह कृत्य सरकारी अफसरों ने ही किया। RUIDP के एईएन और प्रोजेक्ट मैनेजर समेत कुछ अन्य अफसर भी उनके साथ मारपीट में शामिल रहे। 3 आरोपियों को हिरासत में ले लिया गया है। अब एमएलए बिहाणी का कहना है कि पानी के संकट पर जनसुनवाई के दौरान अफसरों ने मारपीट की। अब मामला भी दर्ज हुआ और आरोप-प्रत्यारोप भी जारी है। कारण कुछ भी रहे हों पर विधायक के साथ इस तरह का बर्ताव वाकई शर्मनाक है। वैसे अफसरों की विधायक-सांसद ही नहीं कई बार मंत्रियों से भी कहासुनी होती रहती है। कई बार जनप्रतिनिधि के जबरन रौब दिखाने से अफसर उखड़ जाते हैं तो कई बार गलती बताने पर अधिकारी अभद्रता करने लगते हैं। इस मामले में आगे क्या होगा, यह तो नहीं जानते पर सरकारी दफ्तरों के अफसरों का बर्ताव जब विधायक के साथ ऐसा दिखा तो आमजन का क्या हाल होगा, यह भी किसी से छिपा नहीं है। विधायक के हित में तो सरकार तक आ गई, मामला भी दर्ज हुआ और गिरफ़्तारी भी पर आए दिन लोग सरकारी दफ्तरों में पीटे जाते हैं, कभी कर्मचारी कभी अफसरों द्वारा। सरकारी बैंकों में उपभोक्ताओं का क्या हाल है, यह भी सब जानते हैं।
सरकारी अस्पताल हो या फिर नगर नगम-परिषद या कोई और दफ्तर, आलम यह है कि अफसर से किसी पीड़ा-परेशानी के लिए आमजन सीधे मुलाकात तक नहीं कर सकते। उनके केबिन के बाहर बैठा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लोगों को अलग-अलग बहाने से टरकाता रहता है। सवाल यह भी उठता है कि जब सत्ता और प्रभाव रखने वाला व्यक्ति सुरक्षित नहीं है, तो आमजन के साथ कैसा व्यवहार किया जाता होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी दफ्तर आम जनता की समस्याओं के समाधान का सबसे बड़ा माध्यम होते हैं। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आती है। आमजन की शिकायतें न तो सुनी जाती हैं और न ही समय पर उनका समाधान होता है। हालत यह है कि लोग घंटों दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं, फिर भी अफसरों से मुलाकात तक नसीब नहीं होती। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिकारियों तक पहुंच ही मुश्किल हो गई है। आम नागरिक जब अपनी समस्या लेकर दफ्तर पहुंचता है, तो उसे पहले बाबुओं के स्तर पर ही रोक दिया जाता है। साहब मीटिंग में हैं, व्यस्त हैं, कल आना-ये जवाब अब आम हो चुके हैं। कई बार तो हफ्तों और महीनों तक अफसरों के दर्शन तक नहीं हो पाते, जिससे लोगों में निराशा और गुस्सा बढ़ता जा रहा है। दूसरी ओर, फाइलों का अटकना और काम में अनावश्यक देरी भी बड़ी समस्या है। बिना किसी कारण के फाइलें लंबित रखी जाती हैं, और कई मामलों में काम आगे बढ़ाने के लिए इशारों-इशारों में “लेन-देन” की उम्मीद की जाती है। यह स्थिति न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है, बल्कि आमजन का सिस्टम से भरोसा भी तोड़ती है।
सीधे तो कोई आदमी अपनी बात रख ही नहीं सकता। अफसर मिल भी जाए तो कानून झाड़ता है, उन्हें बताता है कि पहले शिकायत दर्ज कराओ, देखते हैं। बिजली चली जाए तो उसे सुधारने वाले कर्मचारी दो दिन लगा देते हैं, यही हाल जलदाय विभाग का है। अफसर कहते नहीं और कर्मचारी सुनते नहीं। और तो और सरकार कहती है कि थाने में स्वागत कक्ष बना है, जनता की सुनवाई होती है। यह भी बस सुनने में ही अच्छा लगता है। अपने ही मामले की जानकारी लेने पहुंचा पीड़ित आईओ से कई दिनों तक तो मिल ही नहीं पाता और बाकी स्टाफ कहता रहता है कि जांच उनके पास है, वो ही बताएंगे। यह भी देखा जा रहा है कि शिकायत तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय होता जा रहा है। ऑनलाइन पोर्टल और हेल्पलाइन होने के बावजूद उनका प्रभावी उपयोग नहीं हो रहा। शिकायत दर्ज होने के बाद भी कार्रवाई का कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आता, जिससे लोगों को लगता है कि उनकी आवाज कहीं सुनी ही नहीं जा रही। जरूरत है कि सरकारी दफ्तरों में एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जहां आमजन की सुनवाई तय समय में हो। अधिकारियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और उनके काम का मूल्यांकन जनता की संतुष्टि के आधार पर किया जाए। साथ ही, शिकायतों के निस्तारण के लिए सख्त समयसीमा और जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अगर अब भी सुधार नहीं हुआ, तो आम जनता का भरोसा सरकारी तंत्र से पूरी तरह खत्म हो सकता है-और यह किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति होगी। आमजन की सरकारी दफ्तरों में गुहार नहीं सुनी जाए, अफसर-कर्मचारी उसे परेशान करते रहें, बिना ‘मिजाजपुर्सी’ के उस पर ध्यान ही नहीं दिया जाए और सरकार इससे बेखबर रहे तो समझ जाइए कि राजकाज भगवान भरोसे है।



