अब पुलिस महानिदेशक राजीव शर्मा ने झूठा मामला दर्ज कराने वालों पर कार्रवाई करने का एलान किया है। लंबे समय से यह शिकायत रही है कि व्यक्तिगत दुश्मनी, दबाव बनाने या बदले की भावना से लोग झूठी एफआईआर दर्ज करवा देते हैं, जिससे न केवल निर्दोष लोग परेशान होते हैं बल्कि पुलिस और न्याय व्यवस्था पर भी अनावश्यक बोझ बढ़ता है। यह भी सही है कि प्रदेश में बेबुनियाद और झूठी एफआइआर का बढ़ता ग्राफ पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया है। इस साल के शुरुआती चार महीने में ही औसतन हर दिन 48 से अधिक झूठे मामले दर्ज हुए हैं। पुलिस महानिदेशक राजीव शर्मा ने निर्देश दिए हैं कि अब केवल एफआर (फाइनल रिपोर्ट) लगाकर फाइल बंद नहीं होगी, बल्कि झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने वालों को कोर्ट से सजा दिलाने तक पुलिस पीछा करेगी। झूठे मामलों में सर्वाधिक अपहरण और बलात्कार के हैं। झूठे मुकदमों की बढ़ती संख्या अब केवल एक कानूनी समस्या नहीं, बल्कि समाज की खतरनाक मानसिकता का आईना बन चुकी है।
निजी रंजिश हो, जमीन विवाद हो या दबाव बनाने की चाल—एफआईआर को हथियार की तरह इस्तेमाल करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। नतीजा यह कि थाने न्याय के केंद्र कम और आरोपों की लड़ाई के अखाड़े ज्यादा बनते जा रहे हैं। सबसे बड़ा नुकसान उसका हो रहा है, जो बिना किसी गलती के कानून के जाल में फंस जाता है। एक झूठा मामला उसकी प्रतिष्ठा, रोजगार और सामाजिक जीवन को तहस-नहस कर देता है। अदालतों में वर्षों तक चलने वाली लड़ाई अलग। सवाल यह है कि क्या किसी की जिंदगी बर्बाद करने की इतनी आसान छूट होनी चाहिए? इस प्रवृत्ति ने पुलिस व्यवस्था को भी कमजोर किया है। पहले से ही सीमित संसाधनों में काम कर रही पुलिस को अब असली और नकली मामलों में फर्क करने में ही ऊर्जा खर्च करनी पड़ रही है। नतीजा—गंभीर अपराधों की जांच प्रभावित और अपराधियों के हौसले बुलंद। हैरानी की बात यह है कि झूठे मामलों पर सख्त कार्रवाई के प्रावधान होने के बावजूद उनका इस्तेमाल बहुत कम होता रहा है। यही ढिलाई इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देती रही। बार-बार इस बात की मांग उठी कि जब तक झूठे आरोप लगाने वालों को सख्त सजा मिलनी चाहिए। बावजूद इसके ऐसा हुआ नहीं। पुलिस को झूठा मामला समझते ही देर नहीं लगती पर रिपोर्ट दर्ज नहीं करे तो उस पर भी अनेक आरोप लग जाते हैं, ऐसे में मामला भले ही झूठा हो एफआईआर तो दर्ज होनी ही है। अब यह होगा तो पुलिस भी अपने तरीके से इसकी जांच शुरू करेगी, भले ही कुछ महीनों बाद इसमें एफआर लगानी पड़े।
हालांकि, इस सख्ती के ऐलान के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है—क्या इसका सही और निष्पक्ष क्रियान्वयन हो पाएगा? अक्सर देखा गया है कि कानून का इस्तेमाल भी गलत तरीके से हो सकता है। ऐसे में यह जरूरी है कि पुलिस यह सुनिश्चित करे कि किसी भी शिकायतकर्ता को सिर्फ इसलिए न डराया जाए कि उसकी शिकायत गलत साबित हो सकती है। गलत नीयत और जानबूझकर झूठी शिकायत करने वालों पर ही कार्रवाई होनी चाहिए, न कि उन पर जो न्याय की उम्मीद में शिकायत दर्ज कराते हैं। इस दिशा में संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। पुलिस को चाहिए कि वह जांच प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए, ताकि न तो निर्दोष फंसें और न ही असली दोषी बच निकलें। साथ ही, झूठे मामलों पर कार्रवाई के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही तय की जानी चाहिए। यह पहल तभी सफल मानी जाएगी जब इससे न्याय व्यवस्था में भरोसा बढ़े और लोगों में यह संदेश जाए कि कानून का दुरुपयोग किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन न्याय पाने का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा। अब पुलिस महानिदेशक की यह ड्यूटी है कि उनके इस आदेश-निर्देश को राज्य में हर थाने का पुलिसकर्मी पूरी तरह माने, इस पर कार्रवाई करे। कहीं ऐसा ना हो कि फिर स्टाफ नहीं है या समय ही नहीं मिलता, जैसे बहानों से फिर इस अच्छी पहल का खात्मा हो जाए। झूठा मामला दर्ज होने से जहां किसी की इज्जत दाव पर लग जाती है तो कहीं-कहीं पुलिसकर्मियों को भी इसकी आड़ में ‘राहत’ मिल जाती है। सच्चे तरीके से इस पर काम होगा तो पुलिस भी आराम पाएगी।



