बदलते दौर में अब अपने भी अपनों का साथ छुड़ाने लगे हैं। सुसाइड और हत्या की बढ़ती घटनाएं बताती हैं कि सबकुछ सही नहीं है। सबकुछ स्वयं के हित से जुड़ गया है। परिवार तक की जिम्मेदारी उठाने को अब लोग बेगार समझने लगे हैं। बात-बात पर कहा-सुना जाने लगा है, ये कोई मेरी जिम्मेदारी है क्या? जिम्मेदारी से पिण्ड छुड़ाने की यह ‘परम्परा’ वाकई घातक है। रिश्तों में दिखावा ज्यादा समर्पण कम हो चला है। समाज में स्टेटस दिखाने के चलते लोग अपनों को अपना बताने में ही शर्म महसूस करने लगे हैं। दिल्ली में लेबर कोर्ट के एक जज ने फंदे से लटककर जान दे दी, अब न्यायिक अधिकारी पत्नी और आईएएस साली को इसके लिए दोषी बताया जा रहा है। शुरुआती तौर पर यह पति-पत्नी के बीच का विवाद हो सकता है पर आत्महत्या जैसा कदम उठाना कहां की समझदारी है। अखबारों में रिश्तों के होते खून की खबरें खूब पढ़ी जा रही हैं, कहीं पत्नी और चार बच्चों की हत्या कर दी गई तो कहीं पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति को मौत के घाट उतार दिया। आखिर हो क्या रहा है, समझदारी कहां विलुप्त हो गई। समाज एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है, जहां छोटी-छोटी बातों पर जीवन खत्म करने या किसी और का जीवन छीन लेने जैसे चरम कदम तेजी से बढ़ रहे हैं।
मामूली विवाद, रिश्तों में तकरार, आर्थिक दबाव या क्षणिक गुस्सा-इन सबका अंत अब संवाद से नहीं, बल्कि हिंसा या आत्मघाती फैसलों से होता दिख रहा है। यह प्रवृत्ति केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक संकट का संकेत है। धैर्य और संयम कमजोर पड़ते जा रहे हैं। लोग असहमति या असफलता को स्वीकार करने के बजाय उसे अपमान या हार मान बैठते हैं। गुस्से पर नियंत्रण की कमी और तत्काल प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति कई बार ऐसे फैसलों में बदल जाती है, जिनका कोई लौटना नहीं होता। या तो अपने अपनों को ही नहीं समझ पा रहे या फिर समझना ही नहीं चाहते। परिवार पति-पत्नी और बच्चों तक में सिमट गया है। खास रिश्तेदारों के आने पर अब लोग असहज होने लगे हैं। मोबाइल पर बातचीत को ही संबंध का मजबूत नेटवर्क मान लिया गया है। तेजी से बदलते समय ने सुविधाएं बढ़ाई हैं, लेकिन मनुष्यों के बीच की दूरी भी बढ़ा दी है। घर बड़े हुए हैं, साधन बढ़े हैं, संपर्क के माध्यम अनगिनत हो गए हैं, फिर भी रिश्तों की गर्माहट पहले जैसी नहीं रही। यही कारण है कि आज रिश्तों को मजबूत करने की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस हो रही है।
रिश्ते केवल खून के नहीं होते, भरोसे के भी होते हैं। इन्हें बनाए रखने के लिए समय, संवाद और संवेदनशीलता चाहिए। भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने सबसे करीब के लोगों के लिए भी समय नहीं निकाल पा रहे। नतीजा यह है कि छोटी-छोटी गलतफहमियां बड़ी दूरियों में बदल जाती हैं। चिंता की बात यह है कि अब कई बार अपनों के बीच ही अपनापन कम होता दिख रहा है। मामूली विवाद, अहंकार, आर्थिक स्वार्थ या क्षणिक गुस्सा रिश्तों पर भारी पड़ने लगे हैं। परिवारों के भीतर बढ़ती कड़वाहट समाज के लिए भी खतरनाक संकेत है, क्योंकि मजबूत समाज की नींव हमेशा मजबूत रिश्तों पर ही टिकती है। रिश्तों को मजबूत करने का पहला रास्ता है-संवाद। जब बातचीत बंद होती है, तब दूरी शुरू होती है। कई विवाद ऐसे होते हैं जो समय रहते खुलकर बात कर लेने से खत्म हो सकते हैं। लेकिन जब लोग मन में शिकायतें जमा करते रहते हैं, तो वही शिकायतें दीवार बन जाती हैं। हर रिश्ते में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद को मनभेद बनने से रोकना ही परिपक्वता है। हर बार जीतना जरूरी नहीं होता, कई बार रिश्ते बचाना ज्यादा जरूरी होता है। परिवारों में बच्चों को भी रिश्तों की अहमियत समझानी होगी। केवल आधुनिक शिक्षा काफी नहीं, जीवन के संस्कार भी उतने ही जरूरी हैं। यदि नई पीढ़ी यह सीखेगी कि रिश्ते निभाने के लिए त्याग, धैर्य और सम्मान चाहिए, तो आने वाला समाज अधिक संतुलित होगा। आज जरूरत इस बात की है कि रिश्तों को बोझ नहीं, ताकत माना जाए। अपने लोगों के लिए समय निकाला जाए, उनकी बात सुनी जाए, उनकी तकलीफ समझी जाए। क्योंकि कठिन समय में धन, पद और प्रतिष्ठा नहीं, सबसे पहले अपने ही साथ खड़े होते हैं। परेशानियां कभी भी किसी पर भी आ सकती हैं, एक-दूसरे के सहयोग से ही इनका मुकाबला किया जा सकता है। अपनों का खास बनने के लिए मदद को तैयार रहना होगा, रिश्ते बचाने के लिए थोड़ा झुकना भी होगा वरना हालात औ



