संकल्प और कार्रवाई से ही बचेगी राजस्थान की पहचान

    हर धरोहर की जिम्मेदारी तय हो और अतिक्रमण पर बिना समझौता कार्रवाई हो। साथ ही संरक्षण के लिए अलग और पारदर्शी फंड बने। योजनाओं का सख्ती से पालन किया जाए और लापरवाह अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई हो तब ही जाकर हम अपनी विरासत को सहेज पाएंगे। यही नहीं लोगों को भी स्वयं की जिम्मेदारी तय करनी होगी, अपनी राजस्थानी विरासत को बचाने के लिए उनको भी पहल करनी होगी।

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    विरासत सहेजने की कोशिश ठीक ढंग से नहीं की जा रही। राजधानी जयपुर का परकोटा यह दर्शाने के लिए काफी है। जहां अनूठी शैली से बने बाजार के बरामदे जीर्ण-शीर्ण हो रहे हैं। जयपुर का परकोटा केवल ईंट-पत्थरों की दीवार नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। बावजूद इसके जिस परकोटे ने सदियों तक गुलाबी नगरी की शान को संभाले रखा, आज वो बदहाली की मार झेल रहे हैं। इन बरामदों की हालत देखकर साफ लगता है कि संरक्षण के दावे और जमीनी सच्चाई में बड़ा अंतर है। कहीं टूटता प्लास्टर, कहीं गंदगी का अंबार, कहीं अवैध कब्जे तो कहीं रखरखाव के अभाव में जर्जर होती संरचनाएं-यह सब उस शहर की तस्वीर है जिसे विश्व धरोहर का गौरव प्राप्त है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है? नगर निगम, पुरातत्व विभाग और स्थानीय प्रशासन-हर विभाग जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालता नजर आता है। नतीजा यह कि बरामदों की हालत साल-दर-साल बिगड़ती जा रही है। स्मार्ट सिटी की शोर मचाती प्लानिंग भी यहां काम नहीं आ रही।

    परकोटे के बरामदों का मूल उद्देश्य राहगीरों को छाया और सुविधा देना था, लेकिन आज कई जगह ये अवैध कब्जों, अस्थायी दुकानों और सामान के भंडारण का अड्डा बन चुके हैं। जहां विरासत की सांसें बचाने की जरूरत है, वहां प्रशासनिक उदासीनता उसे और कमजोर कर रही है। कभी-कभार रंग-रोगन या ऊपरी मरम्मत कर तस्वीर चमकाने की कोशिश जरूर होती है, लेकिन संरचनात्मक सुधार और नियमित रखरखाव की ओर गंभीरता नहीं दिखती। यह वैसा ही है जैसे जर्जर दीवार पर नया रंग पोतकर उसे सुरक्षित मान लिया जाए। जंतर मंतर, हवा महल और परकोटे की ऐतिहासिक गलियां जयपुर आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र हैं। बरामदों की बदहाली सीधे तौर पर शहर की छवि को नुकसान पहुंचाती है। जयपुर समेत अन्य ऐतिहासिक शहरों की धरोहरें आज जिस बदहाली का शिकार हैं, वह केवल लापरवाही नहीं बल्कि हमारी सामूहिक असंवेदनशीलता का आईना है। जयपुर को “पिंक सिटी” और विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बावजूद यहां की कई पुरातात्विक इमारतें उपेक्षा झेल रही हैं। हवा महल और आमेर किला जैसे प्रसिद्ध स्थलों की देखभाल अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन शहर के कई छोटे किले, बावड़ियां और हवेलियां जर्जर हालत में हैं। यही स्थिति जोधपुर, उदयपुर और बीकानेर जैसे शहरों में भी देखने को मिलती है। राजस्थान की पहचान उसके किले, महल, बावड़ियां और ऐतिहासिक धरोहरें हैं, लेकिन आज इनकी हालत सवाल खड़े कर रही है।

    राजस्थान में संरक्षण के दावे तो बहुत हैं, पर जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश धरोहरें बदहाल स्थिति में हैं और सुधार के प्रयास अधूरे नजर आते हैं। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर और बीकानेर जैसे प्रमुख शहरों में कुछ प्रसिद्ध स्थलों को छोड़ दें, तो सैकड़ों छोटी-बड़ी ऐतिहासिक इमारतें जर्जर अवस्था में हैं। कई जगह दीवारें टूट रही हैं, चित्रकारी मिट रही है और संरचनाएं ढहने के कगार पर हैं। मरम्मत के लिए घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन कार्यान्वयन में ढिलाई बरती जाती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्य सरकार के बीच समन्वय की कमी भी एक बड़ा कारण है। कई धरोहरें यह तय ही नहीं कर पातीं कि उनकी जिम्मेदारी किसकी है।इसके अलावा बजट की कमी, तकनीकी विशेषज्ञों का अभाव और बढ़ते अतिक्रमण ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। शहरीकरण की अंधी दौड़ में ऐतिहासिक स्थलों के आसपास अवैध निर्माण लगातार बढ़ रहे हैं। सरकार की फाइलों में संरक्षण योजनाएं दौड़ती रहती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में धरोहरें दरक रही हैं। अगर सरकार सच में विरासत बचाना चाहती है, तो दिखावे से बाहर निकलना होगा। हर धरोहर की जिम्मेदारी तय हो और अतिक्रमण पर बिना समझौता कार्रवाई हो। साथ ही संरक्षण के लिए अलग और पारदर्शी फंड बने। योजनाओं का सख्ती से पालन किया जाए और लापरवाह अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई हो तब ही जाकर हम अपनी विरासत को सहेज पाएंगे। यही नहीं लोगों को भी स्वयं की जिम्मेदारी तय करनी होगी, अपनी राजस्थानी विरासत को बचाने के लिए उनको भी पहल करनी होगी।