पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा : बदले की भावना या बदलाव का असर

    West Bengal Election Violence: बंगाल की हिंसा का जिम्मेदार वह पूरा माहौल है, जहां राजनीति सेवा नहीं बल्कि वर्चस्व की लड़ाई बन गई है। जब तक सभी दल मिलकर हिंसा के खिलाफ एकजुट नहीं होंगे, प्रशासन पूरी निष्पक्षता से कार्रवाई नहीं करेगा और समाज नफरत की राजनीति को अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक यह सिलसिला रुकना मुश्किल है।

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    West Bengal Election Violence: पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का दौर थम नहीं रहा। हिंसा में मुख्यमंत्री पद के दावेदार सुवेंदु अधिकारी के पीए की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पिछले 3 दिन में पश्चिम बंगाल में तोड़फोड़-बलवे के साथ इस तरह की हिंसा वाकई शर्मनाक है। करीब आधा दर्जन लोगों की तो जान जा चुकी है। पूरे राज्य में डर का माहौल है। हिंसा अब केवल राजनीतिक विवाद नहीं रही, बल्कि यह कानून-व्यवस्था और लोकतंत्र दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। लोकतंत्र में जनता मतदान इसलिए करती है कि शांति और विकास का रास्ता मजबूत हो, न कि चुनाव परिणाम के बाद समाज भय और तनाव में जीने लगे। यदि किसी दल का कार्यकर्ता यह समझने लगे कि राजनीतिक संरक्षण उसे कानून से ऊपर बना देता है, तो यह बेहद खतरनाक स्थिति है। हिंसा करने वाला चाहे किसी भी पार्टी का हो, उसके खिलाफ तुरंत और समान कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का चेहरा निष्पक्ष दिखाई देना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव-राजनीतिक टकराव का रूप अक्सर खूनी संघर्ष में बदल जाता है। चुनाव खत्म होने के बाद भी अगर लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ें, कार्यकर्ताओं की हत्या हो, आगजनी और तोड़फोड़ हो, तो यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

    लोकतंत्र में चुनाव जनता की राय जानने का माध्यम होता है, बदले की राजनीति का नहीं। लेकिन बंगाल की राजनीति में वर्षों से हिंसा एक परंपरा की तरह शामिल हो गई है। सत्ता बदलती रही, दल बदलते रहे, मगर राजनीतिक हिंसा की संस्कृति नहीं बदली। कभी वामपंथ पर आरोप लगे, फिर तृणमूल कांग्रेस पर और अब विपक्ष भी लगातार हमलों की शिकायत कर रहा है। सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक को उठाना पड़ रहा है, जिसका राजनीति से सीधा कोई लेना-देना नहीं होता। चुनाव के बाद हिंसा का सबसे बड़ा कारण राजनीतिक असहिष्णुता और स्थानीय स्तर पर सत्ता का दुरुपयोग माना जाता है। गांवों और कस्बों में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे को दुश्मन की तरह देखने लगे हैं। सत्ता में रहने वाला पक्ष प्रशासनिक तंत्र पर प्रभाव का आरोप झेलता है, जबकि विपक्ष खुद को असुरक्षित बताता है। ऐसे माहौल में निष्पक्ष लोकतंत्र कमजोर पड़ता है। चिंता की बात यह है कि यहां हर बार हिंसा होने के बाद बयानबाजी तो खूब होती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं दिखते। जांच समितियां बनती हैं, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप होते हैं, पर पीड़ितों को न्याय और सुरक्षा समय पर नहीं मिल पाती। यदि किसी राज्य में चुनाव परिणाम के बाद भय और असुरक्षा का माहौल बन जाए, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है।

    असल में बंगाल की हिंसा का जिम्मेदार वह पूरा माहौल है, जहां राजनीति सेवा नहीं बल्कि वर्चस्व की लड़ाई बन गई है। जब तक सभी दल मिलकर हिंसा के खिलाफ एकजुट नहीं होंगे, प्रशासन पूरी निष्पक्षता से कार्रवाई नहीं करेगा और समाज नफरत की राजनीति को अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक यह सिलसिला रुकना मुश्किल है। जमीनी स्तर पर नफरत और टकराव की राजनीति लगातार बढ़ती दिखाई दे तो यह वाकई शर्मनाक है। राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या चुनाव जीतना इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि उसके लिए समाज को हिंसा की आग में झोंक दिया जाए? कार्यकर्ताओं को उकसाने वाली भाषा, विरोधियों को दुश्मन बताने वाली राजनीति और सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने की प्रवृत्ति ने हालात और बिगाड़े हैं। केवल राजनीतिक दलों और प्रशासन को दोष देकर समाज अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। जब समाज राजनीतिक कट्टरता को स्वीकार करने लगे, सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों को समर्थन मिले और हिंसा को “राजनीतिक मजबूरी” कहकर सामान्य बना दिया जाए, तब हालात और भयावह हो जाते हैं। असल में बंगाल की हिंसा का जिम्मेदार वह पूरा माहौल है, जहां राजनीति सेवा नहीं बल्कि वर्चस्व की लड़ाई बन गई है। जब तक सभी दल मिलकर हिंसा के खिलाफ एकजुट नहीं होंगे, प्रशासन पूरी निष्पक्षता से कार्रवाई नहीं करेगा और समाज नफरत की राजनीति को अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक यह सिलसिला रुकना मुश्किल है।

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