Jaipur Suicide Case: एसएमएस मेडिकल कॉलेज के अंतिम वर्ष के छात्र ने फंदे पर लटककर जान दे दी। आत्महत्या के कारण का खुलासा तो नहीं हुआ पर परिजनों के अलग-अलग आरोप हैं। हॉस्टल की आठवीं मंजिल पर सीढ़ियों की रैलिंग पर नितिन यादव ने फंदे पर लटककर जान दे दी। पिछले पांच साल में देशभर में करीब 119 मेडिकल स्टूडेंट ने सुसाइड किया है जो वाकई चिंताजनक है। देशभर में मेडिकल छात्रों की आत्महत्या के बढ़ते मामले इस बात का संकेत हैं कि डॉक्टर बनने की राह अब केवल मेहनत की नहीं, बल्कि असहनीय मानसिक दबाव की परीक्षा बन चुकी है। राजस्थान सहित कई राज्यों में हाल के वर्षों में सामने आई घटनाओं ने यह चिंता और गहरी कर दी है। बढ़ती आत्महत्याएं केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि समाज की बिगड़ती मानसिक और सामाजिक स्थिति का गंभीर संकेत हैं। डॉक्टर बनने का सपना लेकर मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले युवा आखिर ऐसे हालात तक क्यों पहुंच रहे हैं कि उन्हें जिंदगी खत्म करना ही आखिरी रास्ता नजर आने लगे? यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी का मामला नहीं, बल्कि अत्यधिक दबाव और संवेदनहीन होती व्यवस्था का परिणाम है। मेडिकल शिक्षा हमेशा से कठिन मानी जाती रही है, लेकिन अब यह कठिनाई कई छात्रों के लिए मानसिक यातना में बदलती जा रही है।
भारी सिलेबस, लगातार परीक्षाएं, लंबी ड्यूटी, नींद की कमी और हर समय बेहतर प्रदर्शन का दबाव छात्रों को भीतर से तोड़ देता है। एक छोटी असफलता भी उन्हें बड़ा झटका लगने लगती है क्योंकि उनसे हमेशा “सर्वश्रेष्ठ” बने रहने की उम्मीद की जाती है। परिवार और समाज की अपेक्षाएं भी तनाव को बढ़ा रही हैं। मेडिकल कॉलेज में पहुंचने वाले छात्रों को अक्सर सफलता का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यदि पढ़ाई में परेशानी आए, अंक कम हों या किसी विषय में असफलता मिले तो कई छात्र खुद को असफल समझने लगते हैं। वे मानसिक दबाव को किसी से साझा नहीं कर पाते और धीरे-धीरे अवसाद में चले जाते हैं। कुछ मामलों में छात्रों ने लगातार अपमान, मानसिक प्रताड़ना या अनुचित व्यवहार से परेशान होकर आत्महत्या जैसा कदम उठाया। हालांकि हर घटना का कारण अलग हो सकता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि मेडिकल संस्थानों का वातावरण अधिक मानवीय और सहयोगी बनने की जरूरत है। हर मेडिकल कॉलेज में मजबूत और सक्रिय काउंसलिंग सिस्टम अनिवार्य होना चाहिए। केवल औपचारिक हेल्पलाइन या नाममात्र के काउंसलर काफी नहीं हैं। छात्रों को नियमित मानसिक स्वास्थ्य परामर्श, तनाव प्रबंधन सत्र और भावनात्मक सहयोग मिलना चाहिए। यह व्यवस्था ऐसी हो जहां छात्र बिना डर और झिझक अपनी परेशानी साझा कर सकें। परिवारों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है।
माता-पिता को बच्चों पर केवल सफलता का दबाव डालने के बजाय उनकी मानसिक स्थिति को समझना होगा। असफलता को जीवन का अंत मानने वाली सोच बदलनी होगी। छात्रों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि एक परीक्षा या कम अंक उनकी पूरी जिंदगी तय नहीं करते। सरकार को मेडिकल शिक्षा नीति में मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए। मेडिकल कॉलेजों में नियमित मनोवैज्ञानिक जांच, हेल्प सेंटर और छात्र सहायता कार्यक्रमों को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। साथ ही मेडिकल शिक्षा के अत्यधिक दबाव वाले ढांचे की भी समीक्षा आवश्यक है। जो छात्र कल समाज की जिंदगी बचाने वाले हैं, उनकी जिंदगी सुरक्षित रखना भी समाज और व्यवस्था की जिम्मेदारी है। यदि समय रहते संवेदनशील और ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट और गहरा हो सकता है। आत्महत्या रोकने के लिए सबसे जरूरी है—संवाद, सहयोग और संवेदनशीलता। सबसे चिंताजनक बात यह है कि मेडिकल कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अभी भी खुलापन नहीं है। छात्र काउंसलिंग लेने या तनाव की बात बताने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि लोग उन्हें कमजोर समझेंगे। यही चुप्पी कई बार जानलेवा बन जाती है। मेडिकल स्टूडेंट ही नहीं सामान्य स्टूडेंट, प्रतियोगी परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी हों या फिर किसी अच्छे मुकाम पर पहुंचने की कोशिश में लगा युवा, जरा से असफल होने या परेशानी आने पर आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है। ऐसे में सरकार के साथ समाज-परिवार की भी जिम्मेदारी है कि वे संवाद और सहयोग का वातावरण बनाएं ताकि आत्महत्या में कमी आए। वैसे प्रेम प्रसंग, आर्थिक तंगी या फिर उत्पीड़न भी आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ा रहा है। संवाद और संवेदनशीलता से ही इनमें कमी आ सकती है।



