Criminalization Of Politics: चुनाव में स्वच्छ छवि के प्रत्याशी उतारेंगे, मंत्री भी उन्हें ही बनाएंगे जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं हो। यही नहीं पार्टी के अन्य पदों पर भी उन्हीं को नियुक्त किया जाएगा जो कभी विवादों में नहीं रहे। यह बात बरसों से सुनते-पढ़ते आ रहे हैं। भाजपा-कांग्रेस हो या अन्य कोई पार्टी। दावा तो लगभग यही किया जाता है। अभी बंगाल के चुनाव में भी जो देखा जा रहा है, इससे अलग नहीं है। ऐसे ही कांग्रेस कब किसको बिना जांचे-परखे जिला अध्यक्ष बना दे या ब्लॉक अध्यक्ष कह नहीं सकते। नागौर के एक हिस्ट्रीशीटर को उद्योग-व्यापार प्रकोष्ठ का जिला अध्यक्ष बना दिया गया। अब कहा जा रहा है कि ये बड़ी सिफारिश से इस पद पर पहुंचे थे। देश में शायद ही कोई ऐसा दल होगा जो बेदाग छवि वालों को ही चुनावी मैदान में उतारें या पार्टी के पदों पर बिठाएं। चुनाव आयोग के आंकड़े और विभिन्न रिपोर्टें लगातार यह बताती रही हैं कि विधानसभा और लोकसभा में बड़ी संख्या में ऐसे जनप्रतिनिधि हैं, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसके बावजूद राजनीतिक दल न केवल उन्हें टिकट देते हैं, बल्कि कई बार उन्हें महत्वपूर्ण पदों से भी नवाजते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना पर ही सवाल खड़ा करती है। लोकतंत्र की बुनियाद इस विश्वास पर टिकी होती है कि जनता अपने प्रतिनिधि ऐसे लोगों को चुनेगी, जो समाज के हित में काम करें, कानून का सम्मान करें और नैतिक मूल्यों का पालन करें। लेकिन विडंबना यह है कि आज जनप्रतिनिधि बनने की दौड़ में अपराधी प्रवृत्ति के लोग तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है-जब कानून बनाने वाले ही कानून के घेरे में हों, तो आम जनता का भला कैसे संभव है?
पिछले कुछ वर्षों में चुनावी आंकड़े लगातार यह संकेत देते रहे हैं कि संसद और विधानसभाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ी है। इनमें से कई पर हत्या, बलात्कार, अपहरण और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप तक दर्ज हैं। इसके बावजूद वे चुनाव जीतकर सत्ता के केंद्र में पहुंच जाते हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि लोकतंत्र की साख पर भी गहरा आघात है। राजनीतिक दल इस समस्या के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार हैं। जीत की लालसा में वे उम्मीदवारों की छवि और चरित्र को नजरअंदाज कर देते हैं। धनबल और बाहुबल रखने वाले उम्मीदवार चुनावी समीकरणों में फिट बैठते हैं, इसलिए उन्हें प्राथमिकता दी जाती है। दल यह तर्क देते हैं कि चुनाव जीतना जरूरी है, लेकिन यह तर्क लोकतंत्र के मूल्यों को कमजोर करता है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, लगभग 46 फीसद सांसद ऐसे हैं जिन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। यानी हर दो में से लगभग एक सांसद किसी न किसी आपराधिक आरोप का सामना कर रहा है। इन में से करीब 31 फीसद सांसद गंभीर आपराधिक मामलों-जैसे हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध-से जुड़े हैं। साल 2009 में ऐसे सांसद लगभग 14 फीसद थे तो 2014 में बढ़कर 21 प्रतिशत हो गए। साल 2019 में 43 तो अब यह आंकड़ा 46 फीसद हो चुका है।
राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जताना आसान है, लेकिन असली सवाल यह है कि सुधार आखिर आएगा कैसे? वर्षों से यह मुद्दा उठता रहा है, आंकड़े सामने आते रहे हैं, अदालतें भी सख्ती दिखाती रही हैं-फिर भी तस्वीर बहुत ज्यादा नहीं बदली। इसका मतलब साफ है कि समस्या गहरी है और समाधान भी आधे-अधूरे नहीं, बल्कि ठोस और व्यापक होने चाहिए। सबसे पहला कदम राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करना है। जब तक दल खुद यह संकल्प नहीं लेते कि वे गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों को टिकट नहीं देंगे, तब तक बदलाव की उम्मीद कमजोर ही रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद अगर दल ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारते हैं, तो उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई और दंड का प्रावधान होना चाहिए। और सबसे बड़ा फैसला तो जनता को करना होता है कि वो ऐसे प्रत्याशियों को वोट ही न करे। राजनीतिक दलों के अपराधियों को आगे लाने के पीछे यह भी साफ हो जाता है कि कहीं स्वार्थ पूरे किए जा रहे हैं। अब प्रकोष्ठ के अध्यक्ष हिस्ट्रीशीटर बनाने को लेकर बड़े नेता की सिफारिश यह बताने के लिए काफी है कि राजनीति कैसी हो गई है।



