गर्मी आते ही पानी-बिजली की परेशानी बढ़ी, सरकारी दावे फेल

    राजस्थान में गर्मी बढ़ते ही पानी-बिजली संकट गहराने लगा है। जयपुर समेत कई शहरों में कटौती, लो वोल्टेज और पानी की कमी से लोग परेशान हैं। हर साल मांग बढ़ने के बावजूद तैयारी अधूरी रहती है-पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर, कमजोर वितरण और जल प्रबंधन की कमी प्रमुख कारण हैं। समाधान के लिए जवाबदेही तय कर दीर्घकालिक योजना और संसाधनों का बेहतर प्रबंधन जरूरी है।

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    गर्मी आते ही परेशानियां शुरू हो चुकी हैं। पानी के साथ बिजली की किल्लत का असर राजधानी जयपुर समेत प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में देखा जा रहा है। बिजली कटौती चरम पर है तो पानी की सप्लाई भी विभाग के रहमोकरम पर है। कुछ दिन पहले ही बिजली-पानी महकमे के अफसरों ने बार-बार यही कहा था कि इस बार गर्मी में जनता को किसी तरह की परेशानी नहीं आने दी जाएगी। यहां तक कि मंत्रियों के दावे भी इसी तरह के थे। अब हालात यह है कि बिजली कब गुल हो जाए और इसकी वापसी कम होगी, यह तय नहीं है। जयपुर ही नहीं, बल्कि जोधपुर, उदयपुर, कोटा और बीकानेर जैसे बड़े शहरों में भी गर्मी के साथ हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं। कहीं घंटों बिजली कटौती हो रही है, तो कहीं पानी की सप्लाई नाम मात्र की रह गई है। शहरी इलाकों में भी लोग टैंकरों पर निर्भर हो रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति इससे भी अधिक खराब है। जयपुर में बाहरी कॉलोनियों और तेजी से विकसित हो रहे इलाकों में पानी का दबाव इतना कम है कि दिनभर नलों में पानी नहीं आता। वहीं बिजली की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है—पीक ऑवर्स में बार-बार ट्रिपिंग, लो वोल्टेज और अनियोजित कटौती आम हो गई है। यही हाल जोधपुर और बीकानेर जैसे गर्म इलाकों में और ज्यादा गंभीर हो जाता है, जहां तापमान 45 डिग्री के पार जाते ही सिस्टम जवाब देने लगता है।

    अब सवाल उठता है कि आखिर जनता को हर साल इस तरह क्यों परेशान होना पड़ता है? असल में सरकार और विभागों को हर साल पता होता है कि गर्मी में मांग बढ़ेगी, फिर भी पहले से पर्याप्त इंतजाम नहीं किए जाते। बिजली की लाइनें, ट्रांसफॉर्मर और पानी की पाइपलाइनें वर्षों पुरानी हैं, जिनका समय पर न तो रखरखाव होता है और न ही अपग्रेड। नए इलाकों में बसावट तो हो रही है, लेकिन वहां मूलभूत सुविधाओं का विस्तार उसी गति से नहीं हो पा रहा। भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, लेकिन वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण पर ठोस अमल नहीं हो रहा। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह प्राकृतिक संकट कम और प्रशासनिक लापरवाही ज्यादा है। जनता को जानबूझकर परेशान किया जा रहा है, ऐसा कहना भले कठोर लगे, लेकिन जब हर साल एक ही समस्या दोहराई जाती है और समाधान के नाम पर केवल अस्थायी कदम उठाए जाते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। अगर सरकार वास्तव में जनता को राहत देना चाहती है, तो उसे जवाबदेही तय करनी होगी-किस क्षेत्र में क्यों कटौती हुई, पानी क्यों नहीं पहुंचा, और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। साथ ही, दीर्घकालिक योजना बनाकर उस पर सख्ती से अमल करना होगा। यह तो आमजन मानते ही हैं कि कभी-कभार इस तरह की परेशानी हो सकती है पर कई जिलों में तो यह रोजमर्रा की मुसीबत बन चुकी है।

    बिजली को लेकर हर बार कहा जाता है कि उत्पादन क्षमता पर्याप्त है और कटौती की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके बावजूद पीक समय में ट्रिपिंग, लो वोल्टेज और अनियोजित कटौती लोगों की दिनचर्या बिगाड़ देती है। सवाल यह है कि अगर व्यवस्था दुरुस्त है, तो फिर बार-बार यह संकट क्यों? असल में उत्पादन के साथ-साथ वितरण व्यवस्था को मजबूत करने पर उतना ध्यान नहीं दिया गया, जितना जरूरी था। पानी के मामले में स्थिति और भी चिंताजनक है। सरकारें जल संरक्षण और नई योजनाओं के दावे जरूर करती हैं, लेकिन शहरों और कस्बों में हकीकत इसके उलट है। कई इलाकों में दिनों तक पानी नहीं आता, और जहां आता है वहां दबाव इतना कम होता है कि लोगों को टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है। भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, लेकिन इसके नियंत्रण के लिए ठोस और सख्त कदम नजर नहीं आते। जनता की परेशानी समझने की आवश्यकता है। गर्मी से पहले समीक्षा बैठकों और तैयारियों की बातें हुई थीं, उनका क्या हुआ। गर्मी में जब नेता-अफसर बिना एसी के नहीं रह पाते, ऐसे में आमजन को क्या पंखे की हवा खाने का भी अधिकार नहीं है। गर्मी में सबसे बड़ी आवश्यकता पानी-बिजली की ही है, यदि यह ही उपलब्ध नहीं हो पाएगी तो सरकारी सिस्टम को तो जनता घेरेगी ही।