व्यवस्था सुधरेगी तभी तो मिलेगा आमजन को समय पर न्याय

    न्यायपालिका लोकतंत्र का स्तंभ है। अगर यह स्तंभ कमजोर हुआ, तो पूरे सिस्टम की नींव हिल जाएगी। इसलिए अब वक्त आ गया है कि खाली कुर्सियों को भरा जाए-वरना न्याय सिर्फ इंतजार बनकर रह जाएगा। केस बढ़ने का मतलब यह नहीं कि समय पर न्याय ही न मिले। इसके लिए तो इंतजाम सरकार को खुद करने चाहिएं। समय भी तय होना चाहिए और जिम्मेदारी भी। आमजन के साथ अन्याय न हो, इसका ध्यान भी तो रखा जाना चाहिए।

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    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अजय रस्तोगी ने आम आदमी को न्याय नहीं मिलने की पीड़ा उजागर की। उनका कहना भी सही है कि आम आदमी को न्याय नहीं मिल रहा तो उसे किस तरह का न्याय दिया जा रहा है। लंबित मुकदमों का भी हवाला देते हुए कहा कि इस विषय पर जल्द से जल्द कुछ करना होगा। जयपुर में एक कार्यक्रम में रस्तोगी की यह बात वाकई गंभीर है। मुकदमें बढ़ रहे हैं और पद खाली हैं। न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है- यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि आज की न्याय व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है। इस मुद्दे को समझने के लिए इसके मूल कारणों पर नजर डालना जरूरी है। देशभर की अदालतों में लाखों केस लंबित हैं, जिनमें निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक शामिल हैं। मामलों की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, उस अनुपात में न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं हो पा रही। भारत में प्रति लाख आबादी पर जजों की संख्या बेहद कम है। कई अदालतों में पद खाली पड़े रहते हैं, जिससे सुनवाई की गति धीमी हो जाती है। जब एक जज के सामने हजारों केस हों, तो समय पर फैसला आना मुश्किल हो जाता है।

    बताते चलें कि इस कार्यक्रम में न्यायाधीश विनीत कुमार ने भी कहा, आमजन को समय पर न्याय मिलना चाहिए। बरसों से यही सुनते आ रहे हैं कि अदालतों में स्टाफ कम है, न्यायाधीशों की कुर्सी खाली है या फिर पुलिस अथवा अन्य विभागीय कार्यवाही धीमी होने की वजह से फैसले नहीं हो रहे। तो यह समस्या कब हल होगी। फैसले में देरी की वजह कभी वकीलों को बता दिया जाता है तो कभी न्यायाधीशों को। हर बार केवल यही सब कहकर कुछ नहीं होने वाला। ऐसे-ऐसे मामले सामने आते हैं कि फैसले का इंतजार पचास-पचास साल तक करना पड़ रहा है। पॉक्सो के साथ फास्ट ट्रेक अदालतें भी खुलीं, जल्द न्याय की उम्मीद को भी बल मिला पर यहां भी अपेक्षा पूरी नहीं हो पा रहीं। मामलों का बढ़ना इस देरी का मुख्य कारण नहीं है, जब कुर्सियां खाली हैं, तो न्याय समय पर कैसे मिलेगा? सबसे बड़ा असर लंबित मामलों के बढ़ते बोझ के रूप में सामने आता है। एक-एक जज के सामने हजारों मुकदमे होते हैं। स्वाभाविक है कि हर मामले को पर्याप्त समय नहीं मिल पाता और फैसले टलते जाते हैं। नतीजा-सालों तक “तारीख पर तारीख”।यह समस्या सिर्फ संख्या की नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया की धीमी रफ्तार की भी है। कॉलेजियम प्रणाली और सरकार के बीच खींचतान, फाइलों का अटकना, मंजूरी में देरी-इन सबके चलते योग्य उम्मीदवार समय पर न्यायाधीश नहीं बन पाते। कई बार सिफारिशें महीनों, यहां तक कि वर्षों तक लंबित रहती हैं।

    दूसरी ओर, बुनियादी ढांचे और संसाधनों की कमी भी हालात को और खराब करती है। नई अदालतें खोलने, स्टाफ बढ़ाने और तकनीकी सुविधाएं देने की गत बेहद धीमी है। एक गंभीर पहलू यह भी है कि सरकार सबसे बड़ी वादी बनी हुई है। सरकारी विभाग हर छोटे-बड़े फैसले के खिलाफ अपील करते हैं, जिससे अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है। खाली पदों के बीच यह अतिरिक्त दबाव न्याय व्यवस्था को और सुस्त कर देता है। न्याय में देरी, आम आदमी के अधिकारों का हनन है। वर्षों तक केस लड़ते-लड़ते लोग आर्थिक रूप से टूट जाते हैं, और न्याय मिलने तक उसका महत्व भी कम हो जाता है। ऐसे में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाना होगा। खाली पदों को समयबद्ध तरीके से भरना जरूरी है। साथ ही, फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की संख्या बढ़े, वैकल्पिक विवाद निपटान को बढ़ावा मिले और सरकार अनावश्यक मुकदमों से बचे। न्यायपालिका लोकतंत्र का स्तंभ है। अगर यह स्तंभ कमजोर हुआ, तो पूरे सिस्टम की नींव हिल जाएगी। इसलिए अब वक्त आ गया है कि खाली कुर्सियों को भरा जाए-वरना न्याय सिर्फ इंतजार बनकर रह जाएगा। केस बढ़ने का मतलब यह नहीं कि समय पर न्याय ही न मिले। इसके लिए तो इंतजाम सरकार को खुद करने चाहिएं। समय भी तय होना चाहिए और जिम्मेदारी भी। आमजन के साथ अन्याय न हो, इसका ध्यान भी तो रखा जाना चाहिए।

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