दिल्ली में IRS अधिकारी की बेटी की रेप के बाद हत्या कर दी गई। इस अपराध को अंजाम देना वाला उनका नौकर राहुल मीणा ही निकला। हैरान करने वाली बात यह कि उसने इस अपराध से कुछ घंटे पहले अलवर में भी एक महिला से बलात्कार किया। दोनों ही मामलों में वो पीड़िता का जानकार था। आईआरएस अधिकारी के यहां उसने कई महीनों नौकरी की तो अलवर की पीड़िता का पति उसका अच्छा मित्र बताया जाता है। यानी दोनों ही मामलों में भरोसे का भी कत्ल हो गया। देश में बलात्कार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। अधिकांश बलात्कार जान-पहचान वाले ही करते हैं। कई बार ऐसी घिनौना अपराध करने में रिश्तेदार निकलते हैं। आए दिन कभी पत्नी ने प्रेमी के साथ पति का कत्ल कर दिया तो कभी पति ने प्रेमिका के साथ पत्नी को मार डाला। और तो और एक महिला ने अपनी दो बेटियों के साथ पति को महज इसलिए मार डाला कि वो मोबाइल के बारे में डांटता रहता था। छोटी-छोटी बातों पर कत्ल हो रहे हैं, अपने ही अपनों का खून कर रहे हैं। तमाम काउंसलिंग या फिर संत-महात्मा के प्रवचन कारगर साबित नहीं हो रहे। धर्म-आस्था में लीन रहने वाले तक अपराध कर रहे हैं।
समाज में सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है, जब खतरा बाहर से नहीं, भीतर से आने लगे। हाल के कई मामलों में एक डरावना पैटर्न उभरकर सामने आया है-दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में आरोपी कोई अजनबी नहीं, बल्कि घर के आसपास रहने वाले, काम करने वाले या परिचित ही निकलते हैं। यानी जिन पर भरोसा किया गया, वही भरोसे का सबसे बड़ा गुनहगार बन बैठे। यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के कमजोर पड़ने का संकेत है। परिवार अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए जिन लोगों पर निर्भर रहते हैं-नौकर, ड्राइवर, ट्यूटर या परिचित-उन्हीं में से कुछ लोग इस विश्वास का दुरुपयोग कर रहे हैं। इससे हर घर में एक अनदेखा डर पनप रहा है। यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के कमजोर पड़ने का संकेत है। परिवार अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए जिन लोगों पर निर्भर रहते हैं-नौकर, ड्राइवर, ट्यूटर या परिचित-उन्हीं में से कुछ लोग इस विश्वास का दुरुपयोग कर रहे हैं. इससे हर घर में एक अनदेखा डर पनप रहा है। पहले खतरे की पहचान आसान थी-अजनबी से सावधान रहने की सीख दी जाती थी। आज यह परिभाषा उलट चुकी है। अपराधी घर के भीतर तक पहुंच चुके हैं, और कई बार घर के ही लोग इस अपराध की कड़ी बन जाते हैं। यह बदलाव सबसे खतरनाक है, क्योंकि इससे सुरक्षा के सारे पारंपरिक तरीके कमजोर पड़ जाते हैं। हर बड़ी घटना के बाद पुलिस जांच, बयान, गिरफ्तारी-सब कुछ होता है, लेकिन सजा तक पहुंचने में सालों लग जाते हैं। कभी गवाह मुकर जाते हैं तो कभी संदेह का लाभ मिलने पर आरोपी को बरी कर दिया जाता है। हर बार किसी भयावह घटना के बाद सख्त कार्रवाई की मांग उठती है, मोमबत्तियां जलती हैं, बयान आते हैं और फिर धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है। यही चक्र अपराधियों के हौसले को बढ़ाता है।
जब न्याय वर्षों तक लंबित रहता है, तो वह न्याय नहीं, एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है। कोर्ट-कचहरी की देरी अपराधियों के हौसले को बढ़ाती है। देश में दुष्कर्म और हत्या के लिए सख्त कानून मौजूद हैं। लेकिन कानून की सख्ती तब तक बेअसर है, जब तक उसका क्रियान्वयन तेज और निष्पक्ष न हो। पुलिस की जवाबदेही, फॉरेंसिक क्षमता, और न्यायिक प्रक्रिया की गति-इन सभी पर एक साथ काम करना होगा। अपराध रुक नहीं रहे, क्योंकि असली कमी सजा की कठोरता में नहीं, बल्कि उसकी निश्चितता और गति में है। अपराधी यह जानते हैं कि केस लंबा चलेगा, गवाह टूटेंगे, सबूत कमजोर पड़ेंगे-और यही उनकी हिम्मत बन जाती है। न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर है। पीड़ित परिवार सालों तक अदालतों के चक्कर काटता है, जबकि आरोपी कानूनी खामियों का फायदा उठाकर राहत पा लेता है। ऐसे में समाज में यह संदेश जाता है कि अपराध करके भी बचा जा सकता है। अपराध रोकने के लिए केवल कठोर सजा का प्रावधान पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह जरूरी है कि हर अपराधी को यह यकीन हो कि वह बच नहीं पाएगा। कानून का असली असर तब दिखता है, जब उसकी पकड़ तेज और अटल हो। सख्त से सख्त सजा जल्द से जल्द मिले तो अपराधी अपने आप अपराध से दूर हो जाएंगे।



