दिखावे के रोजगार कार्यालय, बेरोजगारों की बढ़ती कतार

    राजस्थान में रोजगार कार्यालय औपचारिकता बनकर रह गए हैं, जहां 22 लाख से अधिक पंजीकरण के बावजूद 5 साल में एक भी सरकारी नौकरी नहीं मिली। संसाधनों, स्टाफ और तकनीक की कमी से ये सिर्फ रजिस्ट्रेशन केंद्र बन गए हैं। समाधान के लिए डिजिटल सुधार, उद्योगों से जुड़ाव, कौशल विकास, स्टार्टअप और निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन पर जोर देना जरूरी है।

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    बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। राजस्थान में सरकारी तो छोड़िए प्राइवेट कंपनियों तक में रोजगार नहीं मिल रहा। एक तरह से समझें तो रोजगार कार्यालय खुद ही ‘बेरोजगार’ हो गए हैं। एक आरटीआई के अनुसार राजस्थान में 22 लाख से अधिक बेरोजगार रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत हैं, लेकिन पिछले 5 वर्षों में रोजगार कार्यालयों के माध्यम से एक भी सरकारी नौकरी नहीं मिली। रोजगार कार्यालयों की स्थिति आज ऐसी हो गई है कि वे युवाओं को रोजगार दिलाने के बजाय केवल पंजीकरण का आंकड़ा बढ़ाने वाली मशीन बनकर रह गए हैं। लाखों बेरोजगार इन कार्यालयों में अपना नाम दर्ज कराते हैं, उम्मीद करते हैं कि कहीं से बुलावा आएगा, लेकिन वर्षों गुजर जाते हैं और कोई सूचना तक नहीं मिलती। यह व्यवस्था युवाओं को सहारा देने के बजाय निराशा ही दे रही है। रोजगार कार्यालय अब औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कागजों में पंजीकरण की संख्या लाखों में है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इन कार्यालयों के माध्यम से रोजगार मिलने के मामले बेहद कम हैं।

    राजस्थान में बेरोजगारी को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। आरटीआई के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, राज्य में बीते 5 सालों में रोजगार दफ्तरों के जरिए एक भी सरकारी नौकरी नहीं मिली। जबकि इस दौरान इन रोजगार दफ्तरों में 22 लाख से ज्यादा युवाओं ने रजिस्ट्रेशन किया गया। जयपुर में सबसे अधिक 2.51 लाख बेरोजगार पंजीकृत हैं। इसके बाद अलवर 1.53 लाख, नागौर 1.34 लाख, झुंझुनूं 1.22 लाख और जोधपुर 86,320 का स्थान है। वहीं जैसलमेर 12,031 और प्रतापगढ़ 14,047 में सबसे कम पंजीकरण दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि प्राइवेट सेक्टर में भी रोजगार के मौके कम होते जा रहे हैं। रोजगार कार्यालयों की पहल, जैसे जॉब फेयर और कंपनियों के साथ मेल-जोल के जरिए 2021 में 86, 2022 में 825, 2023 में केवल 3, 2024 में 23 और 2025 में 71 उम्मीदवारों को ही नौकरी मिल सकी। रोजगार कार्यालय सरकारी उपेक्षा के शिकार हैं। वर्षों से इन कार्यालयों की भूमिका सीमित होती गई, लेकिन उन्हें मजबूत करने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं हुए।

    सवाल यह है कि जब लाखों युवा पंजीकृत हैं, तो सरकार इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने पर ध्यान क्यों नहीं दे रही? रोजगार कार्यालयों में न पर्याप्त स्टाफ है, न तकनीकी संसाधन, न उद्योगों से समन्वय। परिणामस्वरूप ये कार्यालय केवल रजिस्ट्रेशन केंद्र बनकर रह गए हैं। बेरोजगार युवाओं को न नौकरी की सूचना मिलती है, न मार्गदर्शन। आज निजी क्षेत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भर्ती कर रहा है, लेकिन रोजगार कार्यालय अभी भी पुराने तरीके से काम कर रहे हैं। यदि इन्हें ऑनलाइन पोर्टल, डेटा एनालिटिक्स और उद्योगों के साथ लाइव कनेक्ट से जोड़ा जाए, तो यह प्रणाली प्रभावी बन सकती है। सरकार को यह समझना होगा कि केवल सरकारी नौकरियों से बेरोजगारी का समाधान संभव नहीं है। पद सीमित हैं और आवेदक लाखों में। इसलिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना ही सबसे बड़ा समाधान है। उद्योगों को बढ़ावा देना, छोटे और मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन देना और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन की नीति बनाना जरूरी है। कौशल विकास पर भी गंभीरता से काम करने की जरूरत है। बड़ी संख्या में युवा डिग्रीधारी हैं, लेकिन उद्योगों की जरूरत के अनुरूप कौशल की कमी है। सरकार को ऐसी योजना लानी चाहिए जिसमें प्रशिक्षण के साथ नौकरी की गारंटी हो। केवल प्रमाणपत्र देने से नहीं, बल्कि कंपनियों से जोड़कर प्रशिक्षण देना होगा। इससे युवाओं को सीधा लाभ मिलेगा। स्टार्टअप और स्वरोजगार को बढ़ावा देना भी जरूरी है। यदि युवाओं को आसान ऋण, तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो वे खुद रोजगार पैदा कर सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित उद्योग, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण और पर्यटन से जुड़े रोजगार की बड़ी संभावनाएं हैं। सरकार इन क्षेत्रों के लिए विशेष पैकेज ला सकती है। रोजगार कार्यालय का विस्तार हो, छोटे-छोटे रोजगार से युवाओं को लाभान्वित करने की पहल होनी चाहिए। सरकारी नहीं निजी अवसरों पर भी ध्यान देना जरूरी है वरना बढ़ती बेरोजगारी बड़ा संकट लाने वाली है।