पचपदरा रिफाइनरी में आग लग गई। पीएम नरेंद्र मोदी मंगलवार को इसका उद्घाटन करने वाले थे। आग में करोड़ों का नुकसान हुआ, प्रदेश को मिलने वाली सौगात फिलहाल टली। आग हादसा है या साजिश, इसकी भी तलाश की जा रही है। इसकी उच्चस्तरीय जांच के भी आदेश दे दिए गए हैं। हर बार आग लगने के बाद जांच के आदेश दे दिए जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि उन जांचों का अंजाम क्या होता है? हर बड़ी घटना के बाद प्रशासन सक्रिय नजर आता है, जांच कमेटी गठित होती है, बयान दिए जाते हैं, और जनता को भरोसा दिलाया जाता है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। बावजूद इसके कुछ समय बीतते ही मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है और रिपोर्ट या तो आती ही नहीं, या इतनी देर से आती है कि उसका महत्व खत्म हो जाता है। यह सिलसिला नया नहीं है। फैक्ट्री में आग लगे, अस्पताल में हादसा हो, या बाजार में शॉर्ट सर्किट से दुर्घटना-हर बार वही प्रक्रिया दोहराई जाती है। जांच की घोषणा कर दी जाती है, लेकिन जिम्मेदारी तय करने की दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं होती।
शहर में पिछले वर्षों में कई बड़े अग्निकांड हुए-बाजारों में, गोदामों में, फैक्ट्रियों में और अस्पतालों में भी। हर बार शुरुआती हलचल के बाद जांच की बात तो हुई, लेकिन उन रिपोर्टों का क्या हुआ, यह आज तक साफ नहीं हो पाया। एसएमएस अस्पताल में लगी आग की बात हो या फिर अजमेर रोड स्थित पेट्रोल पंप की। जयपुर ही नहीं प्रदेश के कई हिस्सों में आग लगती रहती है, जैसलमेर से चली प्राइवेट बस में लगी आग में दो दर्जन लोग मर गए थे। हर बार हादसे का घिसापिटा कारण शॉर्ट सर्किट बता दिया जाता है। असल कारण तो खोजे ही नहीं जाते। जांच का उद्देश्य केवल कारण पता लगाना नहीं होता, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना भी होता है। मगर जब जांच का परिणाम ही ठोस कार्रवाई में नहीं बदलता, तो पूरी प्रक्रिया औपचारिकता बनकर रह जाती है। यही वजह है कि लापरवाही करने वालों के हौसले कम होने की बजाय बढ़ते हैं। जयपुर सहित कई शहरों में बार-बार सामने आ रही आग की घटनाएं एक गंभीर सच्चाई उजागर करती हैं-आग बुझाने के इंतजाम अब भी नाकाफी हैं। हादसे के बाद दमकल की गाड़ियां देर से पहुंचना, संकरी गलियों में फंस जाना, पानी की कमी और पर्याप्त उपकरणों का अभाव-ये समस्याएं लगभग हर बड़ी घटना में सामने आती हैं।
शहरों का विस्तार तेजी से हुआ है, लेकिन फायर सेफ्टी का ढांचा उसी गति से मजबूत नहीं हुआ। कई व्यावसायिक इमारतों, गोदामों और आवासीय कॉलोनियों में फायर एग्जिट नहीं हैं, हाइड्रेंट काम नहीं करते और अग्निशमन उपकरण सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गए हैं। जब आग लगती है, तब इन खामियों का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है। दमकल विभाग के पास संसाधनों की कमी भी बड़ी चुनौती है। सीमित संख्या में फायर स्टेशन, पुरानी गाड़ियां और प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी के कारण राहत कार्य प्रभावित होता है। कई बार ऊंची इमारतों में आग लगने पर पर्याप्त ऊंचाई तक पहुंचने वाले हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म भी उपलब्ध नहीं होते। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हर घटना के बाद समीक्षा की बात तो होती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकलता। फायर ऑडिट की रिपोर्टें फाइलों में दब जाती हैं और नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं किया जाता।
असल में केवल जांच बिठाने से ही कुछ नहीं होगा, कारण तलाशने होंगे। अक्सर देखा गया है कि बजट में फायर सेफ्टी को प्राथमिकता नहीं मिलती। शहरी विकास तो तेजी से होता है-नई कॉलोनियां, ऊंची इमारतें, औद्योगिक क्षेत्र-लेकिन उसी अनुपात में अग्निशमन ढांचे का विस्तार नहीं होता। परिणाम यह होता है कि एक ही फायर स्टेशन को बड़े इलाके की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, जिससे समय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। हालात यह है कि जिम्मेदार विभाग/ अफसर ही कुछ नहीं देख रहे। प्रदेश में कई पेट्रोल पंप तो ऐसे हैं जहां फायर सेफ्टी सिस्टम ही ठीक ढंग से काम नहीं करते। नागौर के मातृ एवं शिशु कल्याण केन्द्र की ही बात करें वहां यह सिस्टम अभी तक नहीं लगा। ऐसा ही सब जगह है, स्कूल से लेकर मॉल तक इसकी अनदेखी की जा रही है। आखिर सिस्टम में सुधार तो होना चाहिए, आग बुझाने के साधन-संसाधन बढ़ें तो जांच की रिपोर्ट भी तो जल्द आए ताकि उसके हिसाब से ही योजना बने, तैयारी की जा सके। गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो वो चाहें सरकारी हों या कोई और।



