जयपुर के न्यू सांगानेर रोड पर दुकानदारों को फिलहाल कुछ दिनों की राहत मिल गई है। हाईकोर्ट की अगली सुनवाई तक कार्रवाई स्थगित होने से प्रभावित व्यापारियों और परिवारों को समय जरूर मिला है, लेकिन इससे राजधानी में अतिक्रमण की बड़ी समस्या का समाधान नहीं हो जाता। असली सवाल यह है कि जयपुर में कहां-कहां अतिक्रमण हैं, कितनी सड़कें और फुटपाथ इनके कारण सिकुड़ गए हैं और सरकारी जमीन पर कहां अवैध कब्जे हैं? इनका पूरा हिसाब सामने लाने की पहल आखिर क्यों नहीं होती? न्यू सांगानेर रोड का मामला बताता है कि अतिक्रमण को समय रहते नहीं रोका जाए तो हालात किस हद तक बिगड़ सकते हैं। जब कार्रवाई की नौबत आती है, तब दुकानदारों की आजीविका, परिवारों के भविष्य और निर्माण की वैधता को लेकर विवाद खड़े होते हैं। सवाल यह भी है कि यदि सड़क की चौड़ाई कम हो रही थी तो संबंधित विभागों ने पहले ही सर्वे कर कार्रवाई क्यों नहीं की? निर्माण होते समय जिम्मेदार अधिकारी कहां थे? क्या उनकी जवाबदेही तय होगी या हर बार आम लोगों को ही कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा?
शहरों में अवैध निर्माण और अतिक्रमण की समस्या कोई नई नहीं है। सरकारी जमीन हो या सड़क की चौड़ाई, नाले हों या सार्वजनिक रास्ते, जगह-जगह नियमों को ताक पर रखकर निर्माण होते रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि संबंधित विभागों के अधिकारी सब कुछ देखते हुए भी समय रहते कार्रवाई नहीं करते। जब मामला अदालत तक पहुंचता है और सख्त आदेश जारी होता है, तभी प्रशासन की नींद टूटती है। आखिर अवैध निर्माण हटाने के लिए हर बार अदालती आदेश का इंतजार क्यों किया जाए? जयपुर सहित राजस्थान के कई शहरों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान यह सवाल बार-बार सामने आता है। हालात ऐसे बन जाते हैं कि वर्षों से बने निर्माण अचानक कार्रवाई के दायरे में आ जाते हैं। जिन लोगों ने मकान, दुकान या अन्य निर्माण में अपनी पूंजी लगाई, वे कार्रवाई से प्रभावित होते हैं। नियमों के विरुद्ध निर्माण करने वालों की जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए, लेकिन उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए जिनकी निगरानी में अतिक्रमण पनपता रहा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब निर्माण शुरू होता है, तब नगर निकाय, विकास प्राधिकरण और दूसरे संबंधित विभाग क्या कर रहे होते हैं? नक्शे स्वीकृत करने, निर्माण की निगरानी करने और सरकारी जमीन को अतिक्रमण से बचाने की जिम्मेदारी इन्हीं विभागों की है। यदि कोई व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करके निर्माण करता है तो शुरुआती स्तर पर ही कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या विभागों के पास कर्मचारियों और निरीक्षण व्यवस्था की कमी है, या फिर जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही के कारण समस्या बढ़ती जाती है? जहां मिलीभगत के आरोप हों, वहां निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए। अदालतों को सार्वजनिक भूमि, रास्तों और नियमों के पालन से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ता है, लेकिन प्रशासन का काम केवल अदालती आदेशों की पालना तक सीमित नहीं हो सकता। कानून के तहत कार्रवाई करने के लिए विभागों के पास अपने अधिकार और जिम्मेदारियां हैं। यदि हर अतिक्रमण पर कार्रवाई के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े तो फिर स्थानीय प्रशासन की निगरानी व्यवस्था का औचित्य क्या रह जाता है?
यह भी जरूरी है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई निष्पक्ष और समान रूप से हो। प्रभावशाली लोगों के अवैध निर्माण बच जाएं और आम नागरिकों पर ही कार्रवाई हो, तो प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे। कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को नियमानुसार नोटिस, सुनवाई और कानूनी उपायों का अवसर मिलना चाहिए। जहां निर्माण अवैध पाया जाए, वहां कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन किसी को भी मनमानी का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। सरकार और संबंधित विभागों को अब जवाबदेही तय करने की जरूरत है। जिन अधिकारियों के कार्यकाल में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हुआ या नियम विरुद्ध निर्माण बढ़ता रहा, उनकी भूमिका की जांच होनी चाहिए। नियमित निरीक्षण, ऑनलाइन स्वीकृत नक्शों की निगरानी और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई को व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए। अवैध निर्माण हटाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि ऐसे निर्माण होने ही न दिए जाएं। आखिर प्रशासन की सक्रियता अदालत की फटकार के बाद ही क्यों दिखाई देती है? यदि विभाग समय रहते अपनी जिम्मेदारी निभाएं तो न अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा और न ही वर्षों बाद होने वाली कार्रवाई से आम लोगों को परेशानी झेलनी पड़ेगी। कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब अवैध निर्माण पर कार्रवाई किसी अदालती आदेश की मजबूरी नहीं, बल्कि प्रशासन की नियमित जिम्मेदारी बनेगी।



