हत्या में सजायाफ्ता दो महिला बंदियों को घर ले जाकर सफाई करने वाली जेलर गिरफ्तार कर ली गई हैं जबकि फरार महिला प्रहरी की तलाश की जा रही है। यह अजीब वाकया करने वाली जेलर दिव्या चौधरी ने अजमेर जेल में किया। यहां बंद किरण और सना को घर ले जाकर साफ-सफाई कराई। मामला सामने आने पर हड़कंप मचा तो जेलर और प्रहरी सोनिया फरार हो गईं। यहां तो यह कारनामा पकड़ में आ गया पर प्रदेश की कई छोटी जेलों में यह बात अब आम हो गई है। जेलर बंदियों से विशेष सेवा लेने से नहीं चूक रहे। जेल में मोबाइल-नशे का मिलना भी सामान्य तो हो ही गया है। घटनाएं केवल जेल सुरक्षा में छोटी-मोटी चूक नहीं, बल्कि जेल व्यवस्था के भीतर जवाबदेही और निगरानी की गंभीर समस्या की ओर इशारा करती हैं। अजमेर में तत्कालीन महिला जेलर पर दो महिला बंदियों को नियमों के विरुद्ध जेल से निकालकर निजी आवास पर ले जाने और वहां काम कराने के आरोप में कार्रवाई हुई है। इनमें एक आजीवन कारावास की सजा काट रही बंदी भी थी। जयपुर सेंट्रल जेल का उदाहरण भी कम गंभीर नहीं है। पूर्व विधायक बलजीत यादव के युपास मोबाइल, सिम और बैटरी बरामद होने पर एफआईआर दर्ज हुई। इससे पहले भी जयपुर जेल में एक साथ 13 मोबाइल, सिम और चार्जर बरामद होने की खबर सामने आई थी। दौसा जेल में भी तलाशी के दौरान जमीन में छिपाकर रखे मोबाइल और गांजे की बरामदगी हुई।
जेल का मतलब सिर्फ चारदीवारी, ऊंची दीवारें और बंद दरवाजे नहीं है। जेल वह जगह है जहां कानून तोड़ने वाले व्यक्ति को कानून के दायरे में रहकर सजा भुगतनी होती है। लेकिन राजस्थान की जेलों से लगातार सामने आ रही घटनाएं इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। सबसे बड़ा सवाल उन लोगों पर होना चाहिए जिनकी जिम्मेदारी जेल की सुरक्षा है। जेल में मोबाइल पहुंचने के लिए किसी न किसी स्तर पर व्यवस्था को चकमा देना पड़ता है। नशे के लिए भी यही बात लागू होती है। बार-बार बरामदगी यह बताती है कि समस्या केवल बंदियों तक सीमित मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। जेल में अच्छा व्यवहार करने वाले बंदियों को सुधार और पुनर्वास का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन विशेष सुविधा के नाम पर नियमों से छूट नहीं मिल सकती। जेल कोई ऐसी जगह नहीं हो सकती जहां प्रभावशाली या सुविधा पाने वाले बंदियों के लिए अलग व्यवस्था और बाकी के लिए अलग कानून हो। अजमेर की घटना ने तो एक और खतरनाक सवाल खड़ा कर दिया है, क्या किसी जेल अधिकारी को इतनी छूट मिल सकती है कि वह बंदियों को अपने निजी काम के लिए जेल से बाहर ले जाए? यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल व्यक्तिगत दुरुपयोग का मामला नहीं, बल्कि पूरी निगरानी प्रणाली की विफलता है।
अब सरकार को हर ऐसी घटना पर अलग-अलग एफआईआर दर्ज करके मामला बंद करने के बजाय जेलों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए। किस जेल में कितने मोबाइल मिले, कितनी बार नशा मिला, प्रतिबंधित वस्तुएं कैसे पहुंचीं, किन अधिकारियों की ड्यूटी थी और कार्रवाई किस स्तर तक हुई-इसकी नियमित समीक्षा होनी चाहिए। जेलों में अचानक और स्वतंत्र तलाशी, कर्मचारियों की जवाबदेही, सीसीटीवी की प्रभावी निगरानी, मोबाइल जैमर की कार्यशीलता और संवेदनशील पदों पर तैनात कर्मचारियों की निगरानी जरूरी है। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि किसी अधिकारी या कर्मचारी का बंदियों से असामान्य संपर्क तो नहीं है। जेल सुधार का मतलब सिर्फ बंदियों को सुधारना नहीं, जेल प्रशासन को भी जवाबदेह बनाना है। अगर जेल के भीतर मोबाइल पहुंच सकता है, नशा पहुंच सकता है और सजायाफ्ता बंदी नियमों को दरकिनार कर जेल से बाहर जा सकती है, तो फिर सवाल सिर्फ बंदियों से नहीं पूछा जाना चाहिए। सवाल उस पूरी व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए जिसके हाथ में जेल की चाबी है। बार-बार होने वाली ऐसी घटनाओं के बाद अब कार्रवाई सिर्फ घटना सामने आने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले रोकथाम की होनी चाहिए। जेल की सुरक्षा मजबूत होगी तभी कानून-व्यवस्था पर जनता का भरोसा मजबूत रहेगा।



