सरकारी स्कूलों के बच्चों की जान जोखिम में…सुधार का अलाप क्यों?

    उदयपुर के भींडर क्षेत्र के नारदा गांव स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय में कक्षा के दौरान छत का प्लास्टर गिरने से तीन बच्चों के सिर में चोट लगी। राजस्थान में सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों और बच्चों की सुरक्षा को लेकर फिर सवाल उठे हैं। आदेश, निरीक्षण और करोड़ों के बजट के बावजूद ऐसे हादसे क्यों हो रहे हैं?

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    उदयपुर में फिर सरकारी स्कूल की छत का प्लास्टर गिरने से बच्चों के घायल होने की घटना बेहद गंभीर है। घटना उदयपुर के भींडर क्षेत्र की वाणियातलाई ग्राम पंचायत के नारदा गांव स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय में हुई। मंगलवार को कक्षा चल रही थी, तभी छत का प्लास्टर गिर गया। उस समय कमरे में करीब 32 बच्चे मौजूद थे। तीन बच्चों के सिर में चोट लगी और दो को मामूली चोटें आईं। यह केवल एक स्कूल की समस्या नहीं है। जुलाई 2025 में झालावाड़ जिले के पीपलोदी गांव में सरकारी स्कूल की छत गिरने से सात बच्चों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे। सरकारी स्कूलों में आए दिन प्लास्टर गिरने-पटि्टयां गिरने, दीवार टूटने जैसी घटनाएं होती रही हैं। राज्यभर में स्कूल भवनों की स्थिति की जांच कराने और जर्जर इमारतों को सुरक्षित करने के निर्देश दिए गए। मगर उसके बाद भी ऐसी घटनाएं सामने आना बताता है कि केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है।

    सवाल केवल ऐसे हादसों का नहीं है, सवाल यह है कि आखिर सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा कब सरकार की पहली प्राथमिकता बनेगी? हर हादसे के बाद जांच, निरीक्षण, मरम्मत और सुधार के दावे किए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर किसी स्कूल की छत, दीवार या प्लास्टर बच्चों के लिए खतरा बन जाता है। सरकार लगातार स्कूलों के कायाकल्प, भवनों के सुधार और सुविधाएं बढ़ाने की बातें करती है। करोड़ों रुपए खर्च होने के दावे भी सामने आते हैं। फिर सवाल उठता है कि इन दावों का असर स्कूल की इमारतों में दिखाई क्यों नहीं देता? यदि किसी भवन का प्लास्टर कमजोर है, छत जर्जर है या दीवारों में दरारें हैं तो वहां बच्चों को बैठाकर पढ़ाई कैसे कराई जा सकती है? सबसे बड़ी कमी नियमित निरीक्षण और जवाबदेही की व्यवस्था में दिखाई देती है। स्कूल भवन की स्थिति खराब होने की जानकारी हादसे के बाद सामने आए, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। शिक्षा विभाग, स्थानीय प्रशासन और संबंधित इंजीनियरिंग एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे बरसात और सत्र शुरू होने से पहले प्रत्येक स्कूल भवन का तकनीकी निरीक्षण कराएं। जहां खतरा हो वहां बच्चों को कक्षाओं में बैठाने के बजाय तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। सवाल यह भी होना चाहिए कि जिस स्कूल में हादसा हुआ, वहां पहले कभी भवन का निरीक्षण हुआ था या नहीं? रिपोर्ट में क्या दर्ज किया गया? मरम्मत के लिए बजट मांगा गया था तो वह कब मिला? काम हुआ तो उसकी गुणवत्ता की जांच किसने की? सिर्फ हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करने से काम नहीं चलेगा, लापरवाही हादसा होने से पहले पकड़नी होगी।

    राज्य सरकार का कहना है कि स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं के विकास के लिए बड़े पैमाने पर धन खर्च किया जा रहा है। सितंबर 2026 तक की जानकारी के अनुसार, सरकार ने 3,364 कार्य स्वीकृत किए और करीब 1,220 करोड़ रुपये खर्च होने की बात कही है। साथ ही, करीब 5,000 अन्य कार्य प्रगतिरत बताए गए हैं। जब इतने सर्वे, आदेश और बजट की घोषणाएं हो रही हैं तो बच्चों के सिर पर असुरक्षित छतें अब भी क्यों हैं? धन स्वीकृत होना, काम शुरू होना और भवन का वास्तव में सुरक्षित हो जाना तीन अलग-अलग बातें हैं। सरकार को प्रत्येक स्कूल की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए-कहां मरम्मत पूरी हुई, कहां भवन खाली कराया गया, कहां नया भवन बन रहा है और कहां काम अटका हुआ है। हादसों की संख्या गिनने से ज्यादा जरूरी है उन कारणों को खत्म करना, जिनसे हादसे होते हैं। पांच साल का जिला-वार रिकॉर्ड सार्वजनिक हो, हर घटना की जांच रिपोर्ट सामने आए और जिन अधिकारियों या ठेकेदारों की लापरवाही साबित हो, उन पर कार्रवाई हो। साथ ही, जब तक भवन सुरक्षित प्रमाणित न हो, वहां बच्चों की कक्षाएं नहीं चलनी चाहिए।

    सरकार स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं की बात करती है, लेकिन जिस भवन की छत ही सुरक्षित नहीं, वहां आधुनिक शिक्षा का सपना कितना सार्थक है? बच्चे पढ़ने स्कूल जाते हैं, अपनी जान जोखिम में डालने नहीं। जरूरत है कि राज्य के प्रत्येक सरकारी स्कूल का सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। जर्जर भवनों की सूची सार्वजनिक हो, खतरनाक कमरों को तत्काल बंद किया जाए और मरम्मत पूरी होने तक वैकल्पिक कक्षाओं की व्यवस्था हो। केवल बजट जारी करना या आदेश निकालना पर्याप्त नहीं है; काम पूरा हुआ या नहीं, इसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। यदि किसी स्कूल की छत गिरने से पहले जिम्मेदार तंत्र उसे नहीं पहचान सकता, तो फिर बच्चों की सुरक्षा किसके भरोसे है? सरकार को इसका जवाब तो देना चाहिए।

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