बढ़ती नशाखोरी रोकने के लिए सख्त कानून और मजबूत अभियान की आवश्यकता

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    राजस्थान में बढ़ती नशाखोरी को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। युवाओं में शराब और दूसरे नशीले पदार्थों की बढ़ती पहुंच केवल स्वास्थ्य का सवाल नहीं है, बल्कि परिवार, अपराध, सड़क सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था से भी जुड़ा गंभीर मुद्दा है। ऐसे में सरकार की नशामुक्ति की कोशिशों और शराब की उपलब्धता के बीच संतुलन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। गांधी जयंती जैसे दिन, जो देश में नशामुक्ति और सामाजिक सुधार का प्रतीक माना जाता है, उस दिन भी शराब की दुकानें खुली रहें और कहीं रात तक शराब की बिक्री होती रहे तो आम आदमी के मन में सवाल पैदा होना तय है। आखिर एक तरफ नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान और दूसरी तरफ शराब की आसान उपलब्धता- इन दोनों नीतियों का तालमेल कैसे बैठेगा? मुद्दा शराबबंदी का नारा लगाने भर का नहीं है। सरकार को यह देखना होगा कि शराब की दुकानें कहां हैं, उनके आसपास क्या स्थिति है, निर्धारित समय के बाद बिक्री कैसे रुकती है और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कितनी सख्ती होती है। यदि नियम केवल कागज पर हैं और रात के अंधेरे में बिक्री जारी रहती है तो फिर नशाखोरी के खिलाफ अभियान खोखला ही नजर आएगा। यह भी समझना होगा कि शराब से मिलने वाला राजस्व सरकार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उसके सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी नुकसान की कीमत कौन चुकाता है? परिवारों में विवाद, सड़क दुर्घटनाएं, अपराध, युवाओं का नशे की ओर बढ़ना और स्वास्थ्य पर पड़ने वाला असर अंततः समाज और सरकार दोनों पर बोझ डालता है।

    सवाल यह है कि मादक पदार्थों की तस्करी और अवैध बिक्री का नेटवर्क आखिर टूट क्यों नहीं रहा? जब तक नशे का सामान आसानी से उपलब्ध होता रहेगा, तब तक केवल नशे के आदी लोगों को पकड़ने से समस्या खत्म नहीं होगी। सबसे गंभीर सवाल उन आरोपों का है जिनमें अवैध कारोबार को पुलिस की मिलीभगत या कथित शह मिलने की बात सामने आती है। यदि किसी इलाके में लंबे समय तक खुलेआम मादक पदार्थ, अवैध शराब या दूसरे प्रतिबंधित सामान की बिक्री चलती है तो यह मानना मुश्किल है कि स्थानीय तंत्र को इसकी भनक तक नहीं होगी। सवाल फिर केवल तस्कर का नहीं, उस पूरे तंत्र की जवाबदेही का है जो अवैध कारोबार को पनपने देता है। पुलिस कार्रवाई तब प्रभावी मानी जाएगी जब वह केवल छोटे विक्रेताओं तक सीमित न रहे। असली नेटवर्क तक पहुंचना होगा। माल कहां से आता है, कौन पहुंचाता है, पैसा कहां जाता है, कौन संरक्षण देता है और सूचना मिलने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं होती—इन सवालों के जवाब भी तलाशने होंगे।

    यह भी जरूरी है कि किसी पुलिसकर्मी या अधिकारी पर बिना प्रमाण आरोप लगाने के बजाय शिकायतों और संदेहास्पद मामलों की स्वतंत्र जांच हो। जहां मिलीभगत साबित हो, वहां अपराधियों के साथ-साथ जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर भी कठोर कार्रवाई हो। आखिर कानून लागू कराने वाली संस्था ही यदि आंखें मूंद ले तो अवैध कारोबारियों का हौसला क्यों नहीं बढ़ेगा? नशे के खिलाफ लड़ाई का मतलब केवल अधिक गिरफ्तारियां नहीं है। इसका मतलब है सप्लाई लाइन तोड़ना, अवैध बिक्री के अड्डे बंद करना, तस्करी के नेटवर्क को ध्वस्त करना और संरक्षण देने वाले तंत्र की पहचान करना। जब तक नशे का बाजार चलता रहेगा, नई पीढ़ी उसकी गिरफ्त में आती रहेगी। राजस्थान को अब आंकड़ों से आगे जाकर परिणाम दिखाने होंगे। नशा बेचने वाला अपराधी है तो उसे संरक्षण देने वाला भी जांच के दायरे से बाहर नहीं होना चाहिए। जिस दिन अवैध कारोबारियों को यह भरोसा खत्म होगा कि वे किसी प्रभाव या मिलीभगत के सहारे बच सकते हैं, उसी दिन नशे के खिलाफ लड़ाई वास्तव में मजबूत होगी। नशाखोरी रोकनी है तो नशे के बाजार पर प्रहार करना होगा और उस बाजार को संरक्षण देने वाले किसी भी तंत्र को बख्शना नहीं होगा। कानून सख्त करने होंगे और अभियान मजबूत।

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