राजस्थान में सरकार गरीब और जरूरतमंद मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए योजनाएं बनाती है, करोड़ों रुपए खर्च करने के दावे करती है, लेकिन सवाल यह है कि इन योजनाओं का लाभ वास्तव में मरीजों तक कितना पहुंच रहा है? जब सरकारी उपचार योजना ही अस्पतालों में ठीक से लागू नहीं हो पा रही हो तो फिर निजी अस्पतालों में हेराफेरी रोकने के लिए नई-नई निगरानी व्यवस्थाओं का क्या अर्थ रह जाता है? मरीज अस्पताल पहुंचता है तो कभी योजना में इलाज उपलब्ध नहीं होने की बात कही जाती है, कभी दवा बाहर से खरीदने को कहा जाता है और कभी जांच या दूसरे खर्च का बोझ मरीज के परिवार पर डाल दिया जाता है। यदि ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो सरकार को केवल अस्पतालों से जवाब मांगने के बजाय अपने पूरे निगरानी तंत्र की समीक्षा करनी चाहिए। सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का उद्देश्य यही है कि आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति बीमारी के कारण कर्ज में न डूबे। लेकिन यदि योजना का लाभ लेने के लिए मरीज को अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ें, अधिकारी से शिकायत करनी पड़े या इलाज के लिए जेब से पैसा खर्च करना पड़े तो फिर योजना की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों की हर आठ घंटे में फोटो अपलोड करने के आदेश ने अस्पताल संचालकों में हड़कंप मचा दिया है। अस्पताल संचालक इसका विरोध कर रहे हैं और इसे व्यावहारिक कठिनाइयों से जोड़कर देख रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ सरकार का तर्क यह हो सकता है कि मरीज वास्तव में अस्पताल में भर्ती है या नहीं, उसका इलाज हो रहा है या नहीं और अस्पताल मरीजों के नाम पर किसी तरह की अनियमितता तो नहीं कर रहे…इसकी निगरानी जरूरी है। सवाल यह नहीं है कि निगरानी होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि निगरानी का तरीका क्या हो? यदि किसी अस्पताल में फर्जी भर्ती, अनावश्यक इलाज, गलत बिलिंग, बीमा या सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में गड़बड़ी जैसी शिकायतें सामने आती हैं तो सरकार को सख्त व्यवस्था बनानी ही चाहिए। लेकिन हर आठ घंटे में फोटो अपलोड करना ही इसका एकमात्र समाधान मान लिया जाए तो व्यवस्था कागजी खानापूर्ति में भी बदल सकती है। मरीज कोई सरकारी फाइल नहीं है कि उसकी स्थिति का प्रमाण लेने के लिए बार-बार फोटो खींची जाए। उसकी निजता, गरिमा और इलाज की प्रक्रिया का भी ध्यान रखना होगा। गंभीर मरीजों, आईसीयू में भर्ती मरीजों, बच्चों और महिलाओं के मामले में तो अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। फोटो का रिकॉर्ड कहां रहेगा, कौन देखेगा और उसका दुरुपयोग कैसे रोका जाएगा…इन सवालों के जवाब भी व्यवस्था में होने चाहिए। दूसरी तरफ निजी अस्पतालों को भी यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा केवल कारोबार नहीं है। मरीज और उसके परिजन अस्पताल पर भरोसा करके आते हैं। यदि सरकारी योजनाओं, बीमा या भर्ती मरीजों की संख्या को लेकर गड़बड़ी की शिकायतें हैं तो पारदर्शिता से भागने के बजाय अस्पतालों को जांच व्यवस्था में सहयोग करना चाहिए। अस्पताल संचालकों का कहना है कि यह व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है और इससे इलाज की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। उनकी आपत्ति को सुना जाना चाहिए, लेकिन एक सवाल का जवाब भी जरूरी है…यदि व्यवस्था केवल मरीज की वास्तविक स्थिति की निगरानी के लिए है तो निजी अस्पतालों को इससे इतनी परेशानी क्यों हो रही है?
सरकार की जिम्मेदारी है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का पैसा सही मरीज के इलाज पर खर्च हो। यदि कहीं फर्जी भर्ती, अनावश्यक इलाज, गलत बिलिंग या योजना के दुरुपयोग की शिकायतें हैं तो निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी ही होगी। आखिर यह पैसा जनता का है और उसका हिसाब भी जनता के सामने होना चाहिए। निजी अस्पतालों की जवाबदेही तय होनी चाहिए, लेकिन सरकार की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। अस्पतालों की नियमित जांच कौन कर रहा है? योजना के तहत होने वाले इलाज और भुगतान का ऑडिट कौन कर रहा है? मरीज की शिकायत कितने समय में सुलझती है? और सबसे महत्वपूर्ण- जिस इलाज को सरकार ने मुफ्त या योजना के तहत उपलब्ध कराने का वादा किया है, वह मरीज को वास्तव में मिल भी रहा है या नहीं? हर आठ घंटे में मरीज की फोटो अपलोड कराने से लेकर अलग-अलग रिपोर्ट मांगने तक निगरानी के कई तरीके बनाए जा सकते हैं, लेकिन यदि मूल योजना ही अस्पताल में सही ढंग से लागू नहीं होती तो ये व्यवस्थाएं केवल कागजी बोझ बनकर रह जाएंगी। सरकार को अब आंकड़ों और बैठकों से आगे बढ़कर अस्पतालों में जाकर देखना होगा कि योजना का लाभ मरीज को मिल रहा है या नहीं। सरकारी उपचार योजना की सफलता अस्पताल के रिकॉर्ड में नहीं, मरीज के संतोष और बिना अतिरिक्त बोझ मिले इलाज में दिखाई देनी चाहिए।



