नागौर में ASI (एएसआई) के बाद अब जयपुर में SI (एसआई) के रिश्वत लेते पकड़े जाने का मामला सामने आया है। ये घटनाएं उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं, जिस पर आम आदमी कानून और न्याय के लिए भरोसा करता है। आखिर पुलिस महकमे में ऐसा क्या हो रहा है कि रिश्वतखोरी के मामले बार-बार सामने आ रहे हैं? बड़े अफसरों की सीख को कोई काम में ही नहीं ले रहा। न फरियादी को न्याय दिलाने में तत्परता न अपराधिकयों को पकड़ने में सजगता। आखिर खामियां दूर ही नहीं हो पा रहीं, इस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। पुलिस की वर्दी केवल अधिकार का प्रतीक नहीं है, बल्कि भरोसे की भी पहचान है। जब इसी वर्दी में बैठा कोई अधिकारी किसी काम के बदले पैसे मांगता है और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी के जाल में फंसता है, तो चोट केवल उस अधिकारी की छवि पर नहीं पड़ती, बल्कि पूरी व्यवस्था के प्रति आम आदमी के विश्वास पर पड़ती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस विभाग को अपने ही कर्मचारियों की गतिविधियों की जानकारी नहीं होती? क्या शिकायतों और संदिग्ध व्यवहार की निगरानी का कोई प्रभावी तंत्र नहीं है? और यदि तंत्र मौजूद है तो कार्रवाई तब ही क्यों होती है, जब एसीबी जाल बिछाकर किसी अधिकारी को पकड़ती है? यह भी समझना होगा कि हर पुलिसकर्मी को भ्रष्ट मानना उचित नहीं है। बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। लेकिन कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों पर लगते भ्रष्टाचार के आरोपों को केवल ‘व्यक्तिगत गलती’ कहकर छोड़ देना भी समस्या का समाधान नहीं है। सवाल उस वातावरण और निगरानी व्यवस्था का है, जिसमें रिश्वत लेने का दुस्साहस पैदा होता है। आम आदमी थाने में इस उम्मीद से जाता है कि उसकी शिकायत सुनी जाएगी, उसे न्याय मिलेगा और कानून उसके साथ खड़ा होगा। यदि उसे यह महसूस होने लगे कि काम कराने के लिए पैसे देने पड़ेंगे, तो कानून के प्रति भरोसा कमजोर होता है। गरीब और कमजोर व्यक्ति के लिए तो यह स्थिति और भी गंभीर है।
जरूरत केवल रिश्वत लेते पकड़े गए अधिकारी पर कार्रवाई की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि उसने ऐसा करने की हिम्मत कैसे की। क्या पहले भी शिकायतें मिली थीं? क्या वरिष्ठ अधिकारियों ने कभी जांच की? क्या थानों और संवेदनशील पदों पर तैनात पुलिसकर्मियों की कार्यप्रणाली की नियमित समीक्षा होती है? कार्रवाई का उद्देश्य केवल एक व्यक्ति को पकड़ना नहीं, बल्कि उस रास्ते को बंद करना होना चाहिए, जिससे भ्रष्टाचार बार-बार जन्म लेता है। खाकी को खुद को पाक-साफ साबित करने के लिए केवल अपराधियों को पकड़ना पर्याप्त नहीं है। उसे अपने भीतर मौजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ भी उतनी ही कठोरता दिखानी होगी। जनता पुलिस से उपदेश नहीं, ईमानदार व्यवहार और जवाबदेही चाहती है। रिश्वतखोरी का एक मामला सामने आता है, कार्रवाई होती है और फिर कुछ दिन बाद सब सामान्य हो जाता है- यदि यही सिलसिला चलता रहा तो सवाल बना रहेगा…क्या पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार को रोकने की कोशिश हो रही है या सिर्फ रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद कार्रवाई की जा रही है? रिश्वतखोरी का कोई भी मामला गंभीर है, लेकिन जब मामला कानून लागू करने वाली संस्था से जुड़ा हो तो उसकी गंभीरता और बढ़ जाती है। आम नागरिक थाने में इस उम्मीद से जाता है कि उसकी शिकायत सुनी जाएगी, उसे न्याय मिलेगा और कानून उसके पक्ष में खड़ा होगा। यदि उसे लगे कि कार्रवाई भी पैसे के आधार पर होगी, तो पुलिस और जनता के बीच भरोसे की बुनियाद कमजोर होना स्वाभाविक है।
सवाल यह नहीं कि एक पुलिसकर्मी ने रिश्वत क्यों ली। सवाल यह भी है कि ऐसी स्थिति बनने से पहले विभाग की निगरानी व्यवस्था कहां थी? क्या पुलिसकर्मियों के कामकाज की नियमित समीक्षा होती है? क्या शिकायतों को गंभीरता से लिया जाता है? क्या वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थों की कार्यप्रणाली पर पर्याप्त नजर रखते हैं? यह भी जरूरी है कि कुछ कर्मचारियों के भ्रष्ट आचरण को पूरे पुलिस बल का चेहरा न माना जाए। पुलिस में ऐसे हजारों कर्मचारी भी हैं जो कठिन परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। लेकिन बार-बार सामने आने वाली रिश्वतखोरी की घटनाओं को केवल व्यक्तिगत कृत्य मानकर छोड़ देना भी उचित नहीं। इससे विभागीय जवाबदेही का सवाल अनुत्तरित रह जाता है। पुलिस की विश्वसनीयता केवल अपराधियों को पकड़ने से नहीं बढ़ेगी। वह तब बढ़ेगी जब आम आदमी को थाने में बिना किसी सिफारिश, दबाव या पैसे के अपनी बात रखने का भरोसा होगा। उसे यह महसूस होना चाहिए कि कानून सबके लिए समान है और पुलिस की कार्रवाई किसी आर्थिक लेन-देन पर निर्भर नहीं है।



