हिंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है। सरकारी कार्यालयों से लेकर शिक्षण संस्थानों और विभिन्न संगठनों में हिंदी के सम्मान की बातें हो रही हैं। कहीं निबंध प्रतियोगिता है, कहीं भाषण, कहीं हिंदी में काम करने का संकल्प लिया जा रहा है। लेकिन इस अवसर पर एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए- क्या हम वास्तव में हिंदी को अपने कामकाज की भाषा बना पाए हैं या हिंदी पखवाड़ा भी महज एक औपचारिक आयोजन बनकर रह गया है? हिंदी हमारी राजभाषा है। देश के करोड़ों लोगों के संवाद और अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसके बावजूद हमारे सरकारी और गैर-सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रभाव लगातार दिखाई देता है। कार्यालयों की फाइलों से लेकर बैठकों, आदेशों, रिपोर्टों, तकनीकी दस्तावेजों और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक अंग्रेजी का इस्तेमाल इतना सामान्य हो गया है कि हिंदी में काम करना कई बार अपवाद जैसा लगने लगता है।
विडंबना यह है कि हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े के दौरान हिंदी के महत्व पर लंबे भाषण होते हैं, लेकिन पखवाड़ा समाप्त होते ही वही पुरानी व्यवस्था लौट आती है। फिर सवाल यह है कि यदि हिंदी के प्रति सम्मान केवल एक पखवाड़े तक सीमित है तो बाकी साल हिंदी के साथ हमारा व्यवहार कैसा है? भाषा किसी आयोजन से मजबूत नहीं होती। भाषा तब मजबूत होती है जब वह रोजमर्रा के कामकाज में सहजता से इस्तेमाल हो। सरकारी कार्यालय में आम नागरिक को अपनी समस्या बताने के लिए अंग्रेजी पर निर्भर न होना पड़े, सरकारी आदेश और योजनाओं की जानकारी उसे उसकी समझ की भाषा में मिले और प्रशासनिक व्यवस्था में हिंदी का इस्तेमाल केवल अनुवाद भर न रह जाए- तभी हिंदी को वास्तविक सम्मान मिलेगा।
यह भी समझना होगा कि अंग्रेजी सीखना या उसका इस्तेमाल करना हिंदी के खिलाफ होना नहीं है। आज वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी का अपना महत्व है और ज्ञान-विज्ञान, तकनीक तथा अंतरराष्ट्रीय संवाद में उसका उपयोग स्वाभाविक है। समस्या तब पैदा होती है जब अपनी ही भाषा में काम करने की क्षमता और आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगे। आज तकनीक ने हिंदी में काम करना पहले से कहीं आसान कर दिया है। हिंदी टाइपिंग, वॉइस टाइपिंग, अनुवाद और डिजिटल माध्यमों ने भाषा की पहुंच बढ़ाई है। फिर भी अनेक जगह अंग्रेजी को कामकाज की पहली पसंद बनाए रखना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या हम सुविधा के नाम पर अपनी भाषा को पीछे धकेल रहे हैं? हिंदी पखवाड़ा इसलिए भी आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए कि हमारे कार्यालयों में कितनी फाइलें हिंदी में तैयार होती हैं, कितने पत्र हिंदी में जारी होते हैं, कितनी बैठकों में हिंदी सहज कामकाजी भाषा है और कितने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी को बराबर स्थान मिलता है।
सिर्फ पुरस्कार देकर, प्रमाण-पत्र बांटकर या भाषण आयोजित करके हिंदी का विकास नहीं होगा। हिंदी को व्यवहार में उतारना होगा। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को भी यह विश्वास होना चाहिए कि हिंदी में काम करना किसी तरह की कमी नहीं, बल्कि प्रशासन को आम नागरिक के और करीब लाने का माध्यम है। हिंदी पखवाड़े का सबसे बड़ा संदेश यही होना चाहिए कि हिंदी को सम्मान मंच पर नहीं, काम की मेज पर चाहिए। इस बार पखवाड़ा समाप्त होने से पहले यदि हम यह हिसाब कर लें कि सालभर में वास्तव में कितना काम हिंदी में हुआ, तो शायद यह आयोजन अपनी वास्तविक सार्थकता पा सके। वरना हर साल हिंदी के सम्मान में कार्यक्रम होते रहेंगे और कामकाज की भाषा धीरे-धीरे हिंदी से दूर होती जाएगी। हिंदी का मान बढ़ाने के लिए उसको अधिकाधिक प्रयोग में लाया जाए, इसकी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। हिंदी कामकाज की भाषा बननी चाहिए।



