अब मेयर और सभापति भी चुन लिए जाएंगे। पार्षद अपने-अपने वार्ड की जनता से किए वादों को पूरा कराने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जनता भी यही चाहती है कि अब उसके इलाके की समस्याओं पर काम शुरू हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या नई शहरी सरकार पार्षदों की प्राथमिकताओं के अनुसार विकास कार्य करा पाएगी या कुछ समय बाद फिर वही पुराना जवाब सुनने को मिलेगा-बजट नहीं है। सड़क टूटी है तो बजट का इंतजार, नाली बनानी है तो बजट की कमी, स्ट्रीट लाइट लगानी है तो बजट का संकट और सफाई व्यवस्था सुधारनी है तो संसाधनों का अभाव। वर्षों से आम नागरिक ऐसी दलीलें सुनता आया है। सवाल यह नहीं कि निकायों के पास संसाधन सीमित हैं या नहीं, सवाल यह है कि उपलब्ध बजट का इस्तेमाल किस प्राथमिकता से और कितनी पारदर्शिता के साथ किया जा रहा है। पार्षदों ने चुनाव के दौरान अपने वार्ड के लिए बड़े-बड़े वादे किए हैं। अब जनता उनसे यह पूछने का अधिकार रखती है कि उन वादों का रोडमैप क्या है? कौन-सा काम पहले होगा, कितना बजट चाहिए, पैसा कहां से आएगा और काम कब तक पूरा होगा? केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि बजट नहीं है।
बजट निश्चित रूप से किसी भी निकाय की कार्यक्षमता का महत्वपूर्ण आधार है। लेकिन हर समस्या का समाधान केवल अतिरिक्त बजट ही नहीं होता। कई बार जरूरत होती है बेहतर प्राथमिकता तय करने, उपलब्ध संसाधनों के सही इस्तेमाल, निगरानी और विभागों के बीच बेहतर तालमेल की। यदि एक ही काम बार-बार टूटता है और उस पर फिर पैसा खर्च होता है तो सवाल बजट से ज्यादा योजना और निगरानी का भी है। नई शहरी सरकार के सामने इसलिए दोहरी जिम्मेदारी है। एक तरफ उसे उपलब्ध संसाधनों का ईमानदारी और पारदर्शिता से इस्तेमाल करना होगा, दूसरी तरफ सरकार से अतिरिक्त संसाधन हासिल करने के लिए प्रभावी ढंग से पैरवी करनी होगी। जनता को यह भी बताया जाना चाहिए कि उसके वार्ड के लिए कितना बजट उपलब्ध है और उसमें से कितना खर्च हुआ। मेयर-सभापति का पद केवल कुर्सी नहीं, शहर की व्यवस्थाओं को दिशा देने की जिम्मेदारी है। पार्षद भी केवल चुनाव जीतकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाते। उन्हें अपने वार्ड की समस्याओं की सूची बनाकर प्राथमिकता तय करनी चाहिए और नियमित रूप से जनता को प्रगति की जानकारी देनी चाहिए।
मेयर-सभापति किस गणित से चुने गए, यह राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन जनता के लिए असली गणित विकास का है। कितनी सड़कें बनीं, कितनी गलियां रोशन हुईं, कितने नालों की सफाई हुई, सीवर की समस्या कितनी दूर हुई और कितनी शिकायतों का समाधान हुआ- जनता इसी का हिसाब रखेगी। अगर पार्षदों को केवल बोर्ड बनाने के समय याद किया जाएगा और उसके बाद जनता को फिर आश्वासनों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह राजनीति है या जनता के साथ धोखा? लोकतंत्र में सत्ता हासिल करना लक्ष्य हो सकता है, लेकिन जनता का विश्वास बनाए रखना उससे बड़ी जिम्मेदारी है। अब जनता को यह देखने का इंतजार रहेगा कि नई शहरी सरकार पुराने बहानों के साथ आगे बढ़ती है या काम करने का नया तरीका अपनाती है। बजट की कमी वास्तविक समस्या हो सकती है, लेकिन हर असफलता का स्थायी बहाना नहीं बननी चाहिए। जनता ने प्रतिनिधि इसलिए चुने हैं कि वे समस्याओं का समाधान खोजें- सिर्फ समस्याओं की वजहें बताने के लिए नहीं। आवश्यकता पड़ने पर बजट बढ़ाया जाए, इसकी कमी के चलते विकास कार्य नहीं रुके, इसका ध्यान रखा जाए।



