सुप्रीम कोर्ट की सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह के एक बयान ने पूरे देश को चौंका दिया है। हाल ही में उन्होंने कहा कि यौन उत्पीड़न न्यायपालिका का डर्टी सीक्रेट है, इसके बारे में कोई बोलना नहीं चाहता। उन्होंने इस सनसनीखेज दावे में यौन उत्पीड़न के कुछ उदाहरण भी दिए। उनका यह कहना कि कई महिला जजों ने खुद उनसे इस बाबत शिकायत तक की। सबको मालूम है कि पहले तो इस तरह के कुछ केस सार्वजनिक तक हो गए थे। हालांकि आरोपित न्यायाधीशों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। बावजूद यह वाकई गंभीर है कि सुप्रीम कोर्ट की वकील न्यायपालिका में चल रहे इस ‘खेल’ पर सार्वजनिक बयान दे रह हैं तो यह समझ लिया जाए कि सच्चाई ज्यादा है।
न्यायपालिका को देश में न्याय, समानता और अधिकारों की अंतिम उम्मीद माना जाता है। आम नागरिक से लेकर सत्ता के सबसे ताकतवर व्यक्ति तक, जब कहीं से न्याय नहीं मिलता तो अंतिम भरोसा अदालतों पर ही टिकता है। ऐसे में यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र के सामने खड़ा एक गंभीर और असहज सवाल है। सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जो संस्था समाज में महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए कानूनों की व्याख्या करती है, यदि उसके भीतर काम करने वाली महिलाएं स्वयं असुरक्षित महसूस करें तो यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। यौन उत्पीड़न किसी भी कार्यस्थल पर अस्वीकार्य है, लेकिन न्यायपालिका जैसे संवैधानिक संस्थान में इस तरह के आरोपों का सामने आना उसकी विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न बन जाता है। इंदिरा जयसिंह ने अपने अनुभव के आधार पर न्यायपालिका की उस व्यवस्था की ओर भी इशारा किया है, जहां जूनियर और सीनियर के बीच शक्ति का अंतर इतना अधिक हो सकता है कि पीड़ित महिला शिकायत करने से पहले ही अपने भविष्य को लेकर भयभीत हो जाए। नौकरी, पदोन्नति, प्रतिष्ठा और करियर पर संकट का डर अक्सर आवाज को दबा देता है। यही चुप्पी किसी भी संस्थान में गलत व्यवहार को लंबे समय तक छिपे रहने का अवसर देती है।
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने या पूरे न्यायपालिका तंत्र को कटघरे में खड़ा करने का नहीं है। बल्कि जरूरत इस बात की है कि ऐसी शिकायतों को गंभीरता से सुनने और निष्पक्ष जांच की ऐसी व्यवस्था हो, जिस पर पीड़ित को पूरा भरोसा हो। क्या महिला जज और वकील बिना किसी डर के शिकायत कर सकती हैं? क्या शिकायतकर्ता को प्रतिशोध से बचाने की पर्याप्त व्यवस्था है? क्या जांच तंत्र पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी है? इन सवालों के स्पष्ट उत्तर मिलने चाहिए। यौन उत्पीड़न पर चुप्पी किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। न्यायपालिका से देश को केवल न्यायिक फैसलों की नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, समानता और नैतिक आचरण की भी अपेक्षा है। यदि सचमुच कोई ऐसा ‘डर्टी सीक्रेट’ मौजूद है, तो उसे छिपाने के बजाय सामने लाकर उसकी निष्पक्ष जांच और प्रभावी समाधान किया जाना चाहिए। न्याय का सम्मान तभी कायम रह सकता है, जब न्याय देने वाली व्यवस्था के भीतर भी हर महिला स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।
यहां किसी व्यक्ति को आरोप मात्र के आधार पर दोषी ठहराने का सवाल नहीं है।
हर आरोप की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और आरोपी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। लेकिन उतना ही जरूरी है कि गंभीर शिकायतों को प्रतिष्ठा बचाने के नाम पर दबाया न जाए। न्यायपालिका की गरिमा चुप्पी से नहीं, बल्कि सच का सामना करने और दोष पाए जाने पर कार्रवाई करने से बढ़ेगी। इंदिरा जयसिंह के बयान को केवल एक विवादित टिप्पणी मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। यदि पहले भी ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं, तो अब जरूरत आत्ममंथन की है। न्यायपालिका को ऐसी पारदर्शी, स्वतंत्र और विश्वसनीय व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें महिला जज, वकील और कर्मचारी बिना भय के शिकायत कर सकें।



