विधायक से खफा जनता निगम चुनाव में दिखा सकती है तीखे तेवर 

    जयपुर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस-भाजपा के टिकट वितरण, विधायकों की अनदेखी और स्थानीय गुटबाजी का असर दिख सकता है। परिसीमन-आरक्षण से समीकरण बदले हैं। विधायकों के प्रति जनता की नाराजगी पार्षद प्रत्याशियों को नुकसान पहुंचा सकती है। विकास कार्य, बुनियादी समस्याएं और जवाबदेही चुनावी परिणाम प्रभावित करेंगे। जनता जनप्रतिनिधियों से काम और जिम्मेदारी की उम्मीद रखती है।

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    टिकट वितरण के दौरान कांग्रेस-भाजपा का घमासान सामने आ चुका है। कहीं विधायकों की अनदेखी की गई तो कहीं योग्य प्रत्याशी दरकिनार कर दिए गए। एक ही पार्टी के पदाधिकारियों के साथ विधायकों की पटरी नहीं बैठती दिखी तो कहीं-कहीं समझौते को लेकर बार-बार कवायद करनी पड़ रही है। जनता अपने क्षेत्र के विकास को लेकर नाराज तो विधायक से हैं पर इसका गुस्सा पार्षदी चुनाव पर उतारने के लिए तैयार हैं। तकरीबन अस्सी कॉलाेनियों के निवासियों ने नियमन की मांग को लेकर मतदान के बहिष्कार का पहले से ही ऐलान कर दिया है। नगर निगम का चुनाव जहां विधायकों की अनदेखी कर टिकट बंटवारे पर निर्भर करेगा वहीं विधायक की जनता से दूरी-विकाय कार्यों के प्रति बेपरवाही भी इसे प्रभावित करेगी।

    विधायक किसी विधानसभा क्षेत्र की जनता के बीच लगातार काम करता है। उसे अपने क्षेत्र के वार्डों की जमीनी स्थिति, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाताओं के रुझान की जानकारी होती है। ऐसे में पार्षद प्रत्याशी तय करते समय विधायक की राय को पूरी तरह दरकिनार करना समझदारी नहीं कही जा सकती। टिकट केवल संगठनात्मक समीकरण या कुछ नेताओं की पसंद के आधार पर बांटने से चुनावी परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। जयपुर में वार्डों के परिसीमन और आरक्षण के बाद राजनीतिक समीकरण पहले ही बदल चुके हैं। दावेदारों की संख्या भी बहुत अधिक है। ऐसे में टिकट वितरण सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। भाजपा में ही 150 वार्डों के लिए बड़ी संख्या में दावेदार सामने आए हैं। कांग्रेस में भी वरिष्ठ नेताओं की राय और स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए टिकटों पर मंथन हुआ। 

    कई इलाकों में विधायक की कार्यशैली और क्षेत्र की समस्याओं को लेकर जनता में नाराजगी है। सवाल यही है कि कहीं इस नाराजगी का खामियाजा पार्षद का चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों को न भुगतना पड़े। विधायक विधानसभा क्षेत्र का सबसे बड़ा जनप्रतिनिधि होता है। जनता उससे सड़क, पानी, बिजली, सीवर, यातायात, अस्पताल और अन्य बुनियादी समस्याओं के समाधान की उम्मीद करती है। यदि इन समस्याओं का समय पर समाधान नहीं होता और लोगों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता तो स्वाभाविक रूप से नाराजगी पैदा होती है। ऐसे में जयपुर में कई क्षेत्रों में ऐसा ही दिख रहा है, स्थानीय विधायक से असंतुष्ट वोटर पार्षदी चुनाव में परिणाम बदलने के मूड में हैं। हालांकि पार्षद अपने वार्ड का जनप्रतिनिधि होता है। उसकी जिम्मेदारियां और अधिकार अलग हैं। सड़क की छोटी-बड़ी समस्या, सफाई व्यवस्था, नालियों की स्थिति, स्ट्रीट लाइट, पार्कों की देखभाल और स्थानीय स्तर की अनेक समस्याओं के लिए जनता सीधे पार्षद से उम्मीद करती है। ऐसे में किसी विधायक की कथित लापरवाही या निष्क्रियता का गुस्सा उस प्रत्याशी पर निकालना, जो पहली बार चुनाव मैदान में उतरा है, न्यायसंगत नहीं होगा।

    राजनीतिक दलों और स्थानीय नेताओं को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। जनता यह नहीं देखती कि कौन-सी समस्या किस जनप्रतिनिधि के अधिकार क्षेत्र में आती है। उसे तो अपने इलाके में काम चाहिए। यदि लंबे समय से समस्याएं बनी हुई हैं तो नाराजगी स्वाभाविक है। जनता के बीच बनाई गई छवि का असर निकाय चुनाव में भी दिखाई दे सकता है। यदि कार्यकर्ता और प्रत्याशी जनता के बीच वोट मांगने जाएंगे तो उनसे विधायक के कामकाज का हिसाब भी पूछा जाएगा। ऐसे में प्रत्याशियों के लिए अपने दल के जनप्रतिनिधि के काम का बचाव करना मुश्किल हो सकता है। जनता हिसाब करना जानती है और उसके पास यह मौका केवल चुनाव के दौरान ही आता है। ऐसे में हर जनप्रतिनिधियों को सोचना चाहिए कि वो अपनी जिम्मेदारी-जवाबदेही के प्रति ईमानदार रहे।

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