आग के बढ़ते हादसे, बचाव के इंतजाम नाकाफी

    राजस्थान में बढ़ती आग की घटनाएं अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमियों को उजागर कर रही हैं। जयपुर में पार्किंग की आग में 15 वाहन जले और 80 लोगों को बचाया गया, जबकि जेसीटीएसएल बस का अग्निशमन यंत्र खाली मिला। फायर स्टेशनों, दमकल वाहनों, प्रशिक्षित कर्मचारियों और आधुनिक उपकरणों की कमी चिंता बढ़ा रही है। सरकार को नियमित फायर ऑडिट, सुरक्षा निरीक्षण, मॉक ड्रिल, सख्त कार्रवाई और बेहतर त्वरित रिस्पॉन्स व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।

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    आग की बढ़ती घटनाएं लगातार चिंता बढ़ा रही हैं। जयपुर में हाल ही एक आवासीय इमारत की पार्किंग में आग से 15 वाहन जल गए और करीब 80 लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना पड़ा। इससे कुछ ही दिन पहले चलती जेसीटीएसएल बस में आग लग गई और जांच के दौरान उसका अग्निशमन यंत्र तक खाली मिला। कभी अस्पताल में  कभी गोदाम-शोरूम में, आग पर काबू पाने के सिस्टम तो फेल हैं ही, इसकी सुरक्षा के इंतजाम भी पूरे नहीं हैं। आग की घटनाएं केवल हादसे नहीं हैं, बल्कि हमारी अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमजोरियों की ओर इशारा करती हैं। जयपुर से लेकर प्रदेश के दूसरे शहरों तक सवाल यही है कि हादसा होने के बाद दमकल दौड़ाने के बजाय आग लगने से पहले सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए जाते?  सवाल यह है कि आग लगने के बाद दमकल पहुंचाने की व्यवस्था कितनी मजबूत है और आग लगने से पहले सुरक्षा जांच कितनी प्रभावी? राजस्थान में फायर स्टेशनों की जरूरत के मुकाबले बड़ी कमी का आंकड़ा सामने आ चुका है। ऐसे में तेजी से बढ़ते शहरों, बहुमंजिला इमारतों, बाजारों, गोदामों और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए मौजूदा व्यवस्था कितनी पर्याप्त है, यह सरकार को गंभीरता से देखना होगा।

    राजधानी जयपुर में ही संकरी सड़कें, अतिक्रमण, अवैध पार्किंग और घनी आबादी कई बार दमकल के लिए चुनौती बन जाते हैं। दूसरी ओर प्रदेश के छोटे शहरों और कस्बों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। कहीं पर्याप्त दमकल वाहन नहीं हैं, कहीं प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है तो कहीं आधुनिक बचाव उपकरणों का अभाव है। बड़े भवनों में ऊंचाई तक पहुंचने वाले उपकरण और पर्याप्त आपातकालीन निकास भी जरूरी हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि फायर एनओसी और सुरक्षा प्रमाणपत्र की व्यवस्था होने के बावजूद कई जगह वास्तविक स्थिति की नियमित जांच नहीं होती। भवन में लगे अग्निशमन यंत्र काम कर रहे हैं या नहीं, फायर अलार्म चालू हैं या नहीं, आपातकालीन रास्ते खुले हैं या नहीं—इनकी नियमित निगरानी जरूरी है। केवल कागज पर फायर सेफ्टी का प्रमाणपत्र किसी की जान नहीं बचा सकता।सबसे बड़ी चिंता उन जगहों को लेकर है जहां रिहायशी इलाकों के बीच गोदाम, छोटी फैक्ट्रियां और ज्वलनशील सामान का कारोबार चल रहा है। कई भवनों में फायर सेफ्टी के मानकों की अनदेखी होती है। बेसमेंट में अवैध पार्किंग, संकरे रास्ते, आपातकालीन निकास की कमी और अग्निशमन उपकरणों का रखरखाव न होना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा है।

    सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी केवल आग लगने के बाद दमकल भेजने तक सीमित नहीं हो सकती। फायर एनओसी किस आधार पर दी गई, उसका समय-समय पर निरीक्षण हुआ या नहीं, भवन में सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है या नहीं—इन सवालों का जवाब भी तय होना चाहिए। नियमों की अनदेखी करने वालों पर केवल नोटिस नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अग्निशमन व्यवस्था को भी आधुनिक और सक्षम बनाने की जरूरत है। पर्याप्त दमकल वाहन, प्रशिक्षित कर्मचारी, ऊंची इमारतों के लिए आधुनिक उपकरण, पर्याप्त फायर स्टेशन और त्वरित रिस्पॉन्स सिस्टम किसी भी शहर की अनिवार्य जरूरत हैं। दमकलकर्मियों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, लेकिन उनके संसाधनों और प्रशिक्षण पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए।

    आग लगने के बाद नुकसान का आकलन करने और मुआवजा देने से बेहतर है कि हादसा होने ही न दिया जाए। इसके लिए नगर निकाय, अग्निशमन विभाग, पुलिस और प्रशासन को मिलकर नियमित फायर ऑडिट करना होगा। स्कूलों, अस्पतालों, बाजारों, मॉल, होटल, फैक्ट्रियों और बहुमंजिला इमारतों में मॉक ड्रिल भी नियमित होनी चाहिए। आग केवल संपत्ति नहीं जलाती, वह परिवारों की पूरी जिंदगी राख कर सकती है। इसलिए हर घटना के बाद जांच की औपचारिकता पूरी करने के बजाय यह तय करना होगा कि अगली आग को कैसे रोका जाए। प्रशासन को यह समझना होगा कि अग्नि सुरक्षा कोई कागजी खानापूर्ति नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी है।
     

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