टिकट असली दावेदारों को मिले, चयन की प्रक्रिया हो पारदर्शी 

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    जनसेवा को आतुर प्रतिनिधियों की टिकट पाने को लेकर होड़ मची है। भाजपा हो या कांग्रेस, स्वच्छ छवि के साथ जिताऊ दावेदार को टिकट देने का दावा कर रहे हैं। हर बार की तरह टिकट देने के लिए गाइड लाइन में भी आमूल-चूल परिवर्तन किया गया है। बावजूद इसके टिकट दिलाने की ‘ठेकेदारी’ करने वालों की भी कमी नहीं है। हर कोई बड़े नेताओं से मिलवाने और गारंटी के साथ टिकट देने का झांसा दे रहा है। यह भी सही है कि टिकट वितरण के बाद असंतोष तय है। आरोप भी लगेंगे कि पक्षपात हुआ, टिकट बेची गई, चहेतों को उपकृत किया गया, वगैरह-वगैरह। इस बार होने वाले चुनाव से पहले वार्डों में जागो इण्डिया जागो की ओर से कराए गए सर्वे में भी सामने आया कि कई वार्डों में पिछली बार भी ऐसा ही हुआ, टिकट असली दावेदारों को नहीं मिला। आरोप को सही नहीं भी मानें तो इस बात पर तो गौर करना होगा कि क्यों वार्ड की जनता के लिए हमेशा कार्य करने वालों को चुनाव के समय धकिया दिया जाता है?

    सवाल यह है कि आखिर पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए ठेकेदार की जरूरत क्यों पड़ रही है? यदि राजनीति का उद्देश्य जनता की सेवा और वार्ड का विकास है तो प्रत्याशी को अपने काम, जनसंपर्क और साफ छवि के आधार पर समर्थन हासिल करना चाहिए। ठेकेदारों और आर्थिक रूप से प्रभावशाली लोगों के सहारे टिकट या चुनावी ताकत जुटाने की कोशिश लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अच्छा संकेत नहीं है। पार्षद का चुनाव भले ही स्थानीय स्तर का हो, लेकिन इसका सीधा असर शहर की व्यवस्था पर पड़ता है। वार्ड की सफाई, सड़क, नाली, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट, पार्क और अतिक्रमण जैसी समस्याओं से जनता का रोज सामना होता है। इसलिए उम्मीदवार का चयन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह किस नेता के करीब है या किसके पास चुनाव में संसाधन जुटाने की क्षमता अधिक है। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। टिकट वितरण के समय केवल चुनाव जिताने की क्षमता या आर्थिक संसाधनों को आधार बनाने के बजाय उम्मीदवार की सामाजिक स्वीकार्यता, संगठन में योगदान, साफ छवि और जनता के साथ उसके संबंध को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि टिकट के लिए धनबल और प्रभावशाली लोगों की मदद ही सबसे बड़ा पैमाना बन गया तो आम कार्यकर्ता राजनीति से और दूर होता जाएगा।

    टिकट वितरण में सबसे बड़ी जरूरत पारदर्शिता की है। यदि पार्टी ने किसी उम्मीदवार को टिकट दिया है तो उसके चयन का आधार स्पष्ट होना चाहिए। क्या उसका सर्वे कराया गया? क्या वार्ड में उसकी स्वीकार्यता देखी गई? क्या संगठन के स्थानीय कार्यकर्ताओं से राय ली गई? क्या उसके पिछले कामकाज और जनता से जुड़ाव का मूल्यांकन हुआ? इन सवालों के जवाब मिलने चाहिए। राजनीतिक दल अक्सर कहते हैं कि चुनाव जीतने की क्षमता सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव जीतने वाला उम्मीदवार ही जनता का प्रतिनिधित्व कर सकता है। लेकिन केवल चुनाव जिताने वाले समीकरणों के आधार पर टिकट देना लंबे समय में जनता के हित में नहीं हो सकता। पार्षद केवल चुनाव जिताने वाला चेहरा नहीं, बल्कि पांच साल तक वार्ड की समस्याओं को उठाने वाला जनप्रतिनिधि भी है।

    गाइडलाइन में बदलाव यदि परिस्थितियों के अनुसार जरूरी हो तो उसका कारण भी सामने आना चाहिए। बार-बार नियम बदलने और अंतिम समय में नए मापदंड सामने आने से सबसे ज्यादा नुकसान उन कार्यकर्ताओं का होता है जो वर्षों तक पार्टी के लिए काम करते हैं और टिकट की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि संगठनात्मक मेहनत से ज्यादा राजनीतिक पहुंच मायने रखती है। राजनीतिक दलों को टिकट वितरण को बंद कमरों की कवायद बनाने के बजाय इसे अधिक पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया बनाना चाहिए। सर्वे, संगठन की राय, जनता के बीच स्वीकार्यता, पिछला काम और साफ छवि जैसे मापदंड पहले से तय हों और सभी दावेदारों पर समान रूप से लागू किए जाएं। 

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