डूंगरपुर के दोवड़ा ब्लॉक के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय देवकी में क्लॉस रूम की छत भरभरा कर गिर पड़ी। वो तो अच्छा हुआ जो वहां पर कोई स्टूडेंट या शिक्षक नहीं था। दस कमरों के इस स्कूल के दो जर्जर थे। पिछले साल झालावाड़ के एक स्कूल में छत गिरने से सात बच्चों की मौत हो गई थी। सरकारी स्कूलों में इस तरह की घटनाएं अब रोजमर्रा की बात हो चुकी है। हाल ही में जयपुर-जोधपुर में सरकारी स्कूलों का हाल देखने की चाह रखने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को पिटना पड़ा था। अब समझ में यह नहीं आ रहा कि सरकारी स्कूलों में सुधार की कवायद हो भी रही है या नहीं। शिक्षा विभाग के सर्वे के अनुसार 5,667 सरकारी स्कूल भवन जर्जर पाए गए हैं। यह आंकड़ा हफ्तेभर पहले का ही है। इससे पहले विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार 3,768 स्कूल भवन जर्जर चिन्हित किए गए थे, जिनमें 2,558 को आधिकारिक रूप से जर्जर घोषित किया जा चुका था और 1,210 की प्रक्रिया बाकी बताई गई। स्थिति केवल पूरी इमारतों तक सीमित नहीं है। पुराने सर्वे में 41,178 राजकीय विद्यालयों में व्यापक मरम्मत की जरूरत बताई गई थी। वहीं 611 सरकारी स्कूलों के पास अपना भवन ही नहीं है।
यह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं है। यह सीधे-सीधे उन लाखों बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है, जो रोज इन भवनों में पढ़ने जाते हैं। सरकार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने की बात करती है, लेकिन जब स्कूल की छत, दीवारें और कमरे ही सुरक्षित नहीं हों तो इन दावों का क्या मतलब रह जाता है? सबसे चिंता की बात यह है कि जर्जर भवनों की समस्या अचानक पैदा नहीं होती। दीवारों में दरार, छत से पानी टपकना, प्लास्टर गिरना या भवन का कमजोर होना ऐसी स्थितियां हैं, जिनके संकेत काफी पहले मिलने लगते हैं। यदि समय पर नियमित निरीक्षण और मरम्मत की व्यवस्था हो तो किसी स्कूल को जर्जर स्थिति तक पहुंचने से रोका जा सकता है। सवाल है कि इतने बड़े स्तर पर स्कूल भवनों की हालत खराब होने के बावजूद जिम्मेदार विभाग समय रहते क्यों नहीं जागा? सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे किसी भी तरह से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उन्हें सुरक्षित भवन, स्वच्छ शौचालय, बिजली, पेयजल और बेहतर कक्षाएं मिलना उनका अधिकार है। सरकार को यह समझना होगा कि स्कूल भवन पर खर्च कोई अतिरिक्त बोझ नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य में निवेश है।
जरूरत इस बात की है कि प्रदेश के प्रत्येक सरकारी स्कूल का सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। जर्जर भवनों की श्रेणी बनाकर अति खतरनाक भवनों को तत्काल सुरक्षित किया जाए और मरम्मत योग्य भवनों की मरम्मत के लिए पर्याप्त बजट जारी हो। केवल बजट स्वीकृत कर देना पर्याप्त नहीं होगा, काम की गुणवत्ता और समयसीमा की भी निगरानी जरूरी है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी स्कूल भवन की खराब स्थिति की जानकारी सामने आने के बाद बच्चों को उसी भवन में पढ़ने के लिए मजबूर न किया जाए। वैकल्पिक व्यवस्था तत्काल उपलब्ध कराई जाए। स्कूल भवन की मरम्मत कोई ऐसा काम नहीं है जिसे वर्षों तक टाला जाए। बरसात से पहले छतों और भवनों की जांच होनी चाहिए, बिजली व्यवस्था दुरुस्त होनी चाहिए और जहां तत्काल मरम्मत की जरूरत है वहां काम शुरू होना चाहिए। लेकिन अक्सर विभागीय प्रक्रिया, बजट की कमी, टेंडर और स्वीकृतियों के बीच जरूरी काम अटक जाते हैं। इसका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है।
सबसे गंभीर बात यह है कि जर्जर भवनों की जानकारी सामने आने के बावजूद कई जगह सुधार की गति धीमी रहती है। आखिर निरीक्षण करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी क्या है? यदि किसी भवन को खतरनाक माना गया है तो उसकी मरम्मत या पुनर्निर्माण की समयसीमा तय क्यों नहीं होती? और यदि बजट जारी हो चुका है तो काम अधूरा रहने पर संबंधित एजेंसी और अधिकारी से जवाब क्यों नहीं मांगा जाता?सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को बेहतर सुविधाएं देना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। निजी स्कूलों की चमक देखकर सरकारी स्कूलों से तुलना करने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी स्कूलों में सुरक्षित भवन और बुनियादी सुविधाएं तो उपलब्ध हों। शिक्षा सुधार की शुरुआत मजबूत और सुरक्षित स्कूल भवन से ही होती है।



