जयपुर के सदर थाना इलाके में पुत्र ने पिता को कुल्हाड़ी से काट डाला। हत्या में आरोपी की मां भी शामिल थी। रिश्ते फिर लहूलुहान हो गए, समझ न सकने की मजबूरी कहें या फिर रिश्ते न ढो पाने की सनक। विश्वकर्मा थाना क्षेत्र में पत्नी पर अपने पति को जहर देकर मारने की साजिश रचने का आरोप सामने आया। पुलिस जांच के मुताबिक इस मामले में प्रेम संबंध को भी वजह बताया गया है। इसी साल जयपुर में करधनी क्षेत्र में पत्नी पर पति की हत्या और शव को ठिकाने लगाने का आरोप सामने आया था। चाकसू क्षेत्र में भी पति-पत्नी के विवाद ने हत्या का रूप ले लिया। जून में खो-नागोरियान क्षेत्र में नशे के लिए पैसे नहीं मिलने पर बेटे पर अपनी मां की हत्या का आरोप लगा। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अपराधी कई बार कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि वही होता है जिस पर पीड़ित सबसे ज्यादा भरोसा करता है। पति-पत्नी, माता-पिता और संतान जैसे रिश्तों में जब विवाद संवाद के बजाय हिंसा तक पहुंचने लगे तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने का भी गंभीर संकट है।
रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट के पीछे संपत्ति, प्रेम संबंध, नशा, घरेलू हिंसा, आर्थिक तनाव और आपसी अविश्वास जैसे कई कारण हो सकते हैं। लेकिन किसी भी विवाद का समाधान हत्या या हिंसा नहीं हो सकता। परिवारों में छोटे विवादों को समय रहते समझना और सुलझाना जरूरी है। पड़ोसी, रिश्तेदार और समाज भी तब तक चुप न रहें जब तक कोई बड़ी घटना न हो जाए। पुलिस के सामने भी चुनौती केवल हत्या के बाद आरोपी पकड़ने की नहीं है। घरेलू हिंसा, धमकी और लगातार हो रहे पारिवारिक विवादों की शिकायतों को गंभीरता से लेना होगा। कई बार बड़ी वारदात से पहले छोटे-छोटे संकेत मिलते हैं, जिन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। जरूरत इस बात की है कि परिवार में संवाद बढ़े, नशे पर नियंत्रण हो, महिलाओं और बुजुर्गों की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए और विवादग्रस्त परिवारों तक परामर्श तथा कानूनी सहायता पहुंचाई जाए। रिश्तों में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद का परिणाम मौत बन जाए, इससे बड़ी सामाजिक विडंबना और क्या होगी?
ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि रिश्तों में संवाद और सहनशीलता कम होती जा रही है, जबकि गुस्सा, अविश्वास, नशा, आर्थिक तनाव, विवाहेतर संबंध, संपत्ति विवाद और घरेलू कलह जैसे कारण हिंसा को बढ़ा रहे हैं। कई मामलों में परिवार को पहले से तनाव या धमकी की जानकारी होती है, लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता। असली चिंता यह है कि परिवारों में संवाद कम हो रहा है और छोटी-छोटी बातों पर विवाद इस हद तक पहुंच रहा है कि समझौते और समाधान की जगह हिंसा को रास्ता बना लिया जाता है। कई मामलों में हिंसा अचानक नहीं होती। परिवार में लंबे समय से विवाद, धमकी, मारपीट या तनाव चलता रहता है। आसपास के लोगों को भी इसकी जानकारी होती है, लेकिन अक्सर यह कहकर चुप रह जाते हैं कि यह उनका पारिवारिक मामला है। यही चुप्पी कई बार बड़ी वारदात का रास्ता खोल देती है। पुलिस की भूमिका भी केवल घटना के बाद आरोपी को गिरफ्तार करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
घरेलू हिंसा, धमकी और लगातार विवाद की शिकायतों को गंभीरता से लेकर जोखिम वाले मामलों की पहचान करनी होगी। पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग, सामाजिक संगठनों और काउंसलिंग सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय से कई मामलों में समय रहते हस्तक्षेप किया जा सकता है। परिवारों को भी समझना होगा कि मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन उसका समाधान हिंसा नहीं हो सकता। नशे की समस्या, आर्थिक तनाव या पति-पत्नी के विवाद को समय रहते परिवार और विशेषज्ञों की मदद से सुलझाया जाए। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की शिकायतों को ‘घर की बात’ कहकर दबाने की प्रवृत्ति खत्म करनी होगी। समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि किसी घर से लगातार झगड़े, चीख-पुकार या हिंसा की आवाज आती है तो पड़ोसियों और रिश्तेदारों को संवेदनशीलता के साथ हस्तक्षेप या संबंधित तंत्र को सूचना देने की जरूरत है। किसी रिश्ते में हिंसा को सामान्य मान लेना आने वाले खतरे को निमंत्रण देना है।



