राजस्थान में आगामी शहरी स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर सोमवार को राज्य की 309 निकायों के कुल 10,245 वार्डों के आरक्षण के लिए लॉटरी निकाली गई। जिन वार्डों में आरक्षण की स्थिति में बदलाव हुआ है, वहां पुराने निवर्तमान पार्षदों को नए वार्ड तलाशने पड़ रहे हैं, जबकि लंबे समय से तैयारी कर रहे नए दावेदारों के लिए चुनाव मैदान में उतरने के नए अवसर खुल गए हैं। मतलब फिर चुनाव आ रहे हैं, वोट मांगने वाले वादा कर आपके क्षेत्र के विकास को चार चांद लगाने का दावा करेंगे। जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, बीकानेर सहित प्रदेश के नगर निगम तो बड़े शहरों और जिला मुख्यालयों में नगर परिषद के साथ नगरपालिका मंडल में पार्षदों के वार्ड चुनाव होंगे। करीब 10,245 वार्डों में पार्षद चुने जाने की जानकारी सामने आई है। वैस आम भाषा में इन्हें भी जनप्रतिनिधि कहा जाता है। कांग्रेस-भाजपा तो अपनी तैयारी में जुट ही गई है, साथ ही निर्दलीय प्रत्याशी भी पार्षद बनने की जुगाड़ करने लगे हैं। सड़कों पर नए दावे-वादे के साथ राखी की बधाई देने वाले बैनर-पोस्टर ही बताने लगे हैं कि वोट मांगने का समय आने वाला है। जयपुर के लिए इस बार खास बदलाव है। ग्रेटर और हेरिटेज नगर निगम को मिलाकर फिर एक नगर निगम बनाया गया है और इसमें 150 वार्ड होंगे। महापौर पद को इस बार अनारक्षित रखा गया है।
जल्द ही वे चेहरे फिर जनता के दरवाजे पर दिखाई देंगे, जो पांच साल तक विकास के बड़े-बड़े दावे करते रहे हैं। इस बार मतदाता को केवल प्रत्याशी का परिचय, पार्टी का नाम या चुनावी वादा सुनकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए। वोट मांगने आए पार्षद से सवाल भी होना चाहिए और पिछले कार्यकाल का हिसाब भी। जिस वार्ड में सड़कें टूटी हैं, नालियां जाम हैं, सीवर की समस्या है, कचरा नियमित नहीं उठता, पार्क बदहाल हैं या स्ट्रीट लाइटें महीनों से खराब हैं, वहां पार्षद से पूछा जाना चाहिए कि आखिर पांच साल में क्या किया गया? नगर निकाय का चुनाव महज पार्षद चुनने का चुनाव नहीं है। पार्षद सीधे जनता के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा जनप्रतिनिधि होता है। मोहल्ले की सड़क से लेकर सफाई, नाली, रोशनी, पार्क, अतिक्रमण और स्थानीय समस्याओं को नगर निगम या परिषद तक पहुंचाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए मतदाता को यह जानना जरूरी है कि उसका प्रतिनिधि पांच साल तक कितना सक्रिय रहा।
अक्सर चुनाव के समय सड़क बनाने, पानी की समस्या दूर करने, पार्क विकसित करने और सफाई व्यवस्था सुधारने के वादे किए जाते हैं। चुनाव जीतने के बाद वही वादे फाइलों और बैठकों में खो जाते हैं। जनता पांच साल इंतजार करती रहती है और फिर चुनाव आते ही वही नेता नए वादों के साथ दरवाजे पर खड़ा दिखाई देता है। अब यह सिलसिला बदलना चाहिए। मतदाता को इस बार कुछ सीधे सवाल करने चाहिए—पिछले पांच साल में वार्ड के लिए कितने काम स्वीकृत हुए? कितने पूरे हुए? कितना बजट आया और कहां खर्च हुआ? लंबित काम क्यों नहीं हुए? सफाई व्यवस्था क्यों नहीं सुधरी? जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ? पार्कों की हालत क्यों खराब है? और सबसे बड़ा सवाल—पांच साल में जनता के बीच कितनी बार पहुंचे? आमतौर पर अक्सर होता यह है कि पार्षद-सभापति कुछ लोगों-नेताओं के चंगुल में फंसे रहते हैं, उन्हें आम वोटरों की खैर-खबर लेने की फुर्सत ही नहीं होती। आम आदमी मिलने जाए तो मिलते नहीं हैं और बुलाए तो आते नहीं। जरा-जरा सी समस्याओं पर ध्यान नहीं देते। और तो और अवैध अतिक्रमण को सपोर्ट करते हैं तो अन्य समस्याओं की भी अनदेखी करते हैं। ऐसे पार्षदों से सावधान रहिए….वोट मांगने आए तो सवाल जरूर करना। कहीं फिर से आपका गलत चयन पांच साल के लिए आपका सरदर्द नहीं बन जाए।



