नए मीटर से बिजली चोरी तो रुकी नहीं, बिल जरूर बढ़ गए

    राजस्थान में बिजली चोरी पर कार्रवाई सुस्त होने के साथ निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। खींवसर समेत कुछ क्षेत्रों में चोरी में कमी का दावा है, लेकिन कमजोर उपभोक्ताओं पर कार्रवाई और प्रभावशाली लोगों को कथित छूट की शिकायतें हैं। नए मीटर लगने के बाद बढ़े बिजली बिलों से भी नाराजगी है। विभाग से पारदर्शी जांच, समान कार्रवाई और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा की मांग है।

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    बिजली चोरी बंद नहीं हो पा रही। इस पर कार्रवाई भी फिलहाल सुस्त पड़ी है। गिने-चुने मामले पकड़े जा रहे हैं, हालांकि सरकार का दावा है कि बिजली चोरी पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। बिजली चोरी के मामले में टॉप पर रहे वाले खींवसर विधानसभा क्षेत्र में भी अब इसमें भारी गिरावट आई है। नागौर, अलवर-भरतपुर, जैसलमेर समेत कुछ जिले बिजली चोरी के मामले में कुछ समय पहले से मशहूर हैं। अक्सर शिकायतें सामने आती हैं कि कमजोर और गरीब उपभोक्ताओं के खिलाफ बिजली चोरी के मामले बनाने में विभाग तेजी दिखाता है, जबकि प्रभावशाली लोगों के यहां गड़बड़ी मिलने के बावजूद कार्रवाई उतनी सख्त नजर नहीं आती। यदि ऐसा है तो यह केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं, बल्कि व्यवस्था में भरोसे का संकट भी है। बिजली चोरी से सरकारी बिजली कंपनियों को आर्थिक नुकसान होता है और इसका बोझ अंततः ईमानदारी से बिल चुकाने वाले उपभोक्ताओं पर पड़ता है। इसलिए चोरी रोकना जरूरी है, लेकिन कार्रवाई निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए।

    मीटर में गड़बड़ी, अवैध कनेक्शन या लाइन से छेड़छाड़ के मामलों की जांच तकनीकी प्रमाणों के आधार पर हो तथा किसी निर्दोष उपभोक्ता को केवल लक्ष्य पूरा करने के लिए आरोपी नहीं बनाया जाए। विभाग को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जांच टीमों की कार्रवाई की नियमित निगरानी हो। शिकायतों की स्वतंत्र जांच, कार्रवाई की वीडियोग्राफी और मामलों की समीक्षा जैसे कदम अपनाए जा सकते हैं। साथ ही बड़े बकायेदारों और प्रभावशाली उपभोक्ताओं के यहां भी उसी सख्ती से जांच होनी चाहिए, जिस तरह आम उपभोक्ताओं के खिलाफ होती है। बिजली चोरी के खिलाफ अभियान तभी सफल माना जाएगा, जब कार्रवाई का पैमाना सभी के लिए समान हो। कमजोर को निशाना बनाकर आंकड़े सुधारना समाधान नहीं है। असली जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें चोरी करने वाला चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कार्रवाई से बच न सके और निर्दोष उपभोक्ता बेवजह परेशान न हो। बिजली चोरी रोकनी है तो भेदभाव भी रोकना होगा।

    मजे की बात यह कि बिजली चोरी रोकने और सही खपत दर्ज करने के नाम पर घरों में नए मीटर लगाए जा रहे हैं, लेकिन इनके बाद बिजली के बिल बढ़ने की शिकायतों ने उपभोक्ताओं की नाराजगी बढ़ा दी है। जयपुर से लेकर प्रदेश के दूसरे शहरों और गांवों तक कई उपभोक्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि पुराने मीटर की तुलना में नए मीटर लगने के बाद उनकी खपत और बिल अचानक कैसे बढ़ गए। शिकायतें लगातार आ रही हैं, लेकिन उनका संतोषजनक समाधान नहीं हो पाना चिंता का विषय है। स्मार्ट या नए मीटर तकनीक के लिहाज से बेहतर हो सकते हैं, लेकिन उपभोक्ता के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसका बिजली बिल है। यदि किसी परिवार की वास्तविक खपत में बड़ा बदलाव नहीं हुआ और इसके बावजूद बिल में अचानक वृद्धि हो रही है तो बिजली निगमों को इसे केवल उपभोक्ता की शिकायत मानकर टालना नहीं चाहिए। हर ऐसी शिकायत की तकनीकी जांच होनी चाहिए।

    बिजली कंपनियों को यह स्पष्ट करना होगा कि नए मीटर किस आधार पर रीडिंग दर्ज कर रहे हैं, उनकी जांच और कैलिब्रेशन की व्यवस्था क्या है तथा गलत रीडिंग की स्थिति में उपभोक्ता को राहत कैसे मिलेगी। साथ ही मीटर बदलने से पहले और बाद की खपत का तुलनात्मक रिकॉर्ड उपभोक्ता को उपलब्ध कराया जाना चाहिए, ताकि भ्रम की स्थिति न बने। बिजली चोरी रोकना जरूरी है और इसके लिए आधुनिक मीटर उपयोगी भी हो सकते हैं, लेकिन व्यवस्था की सफलता तभी मानी जाएगी जब ईमानदार उपभोक्ता को परेशानी न हो। मीटर बदलने से तकनीक आधुनिक हो सकती है, लेकिन उपभोक्ता का भरोसा तभी बढ़ेगा जब बिल भी पारदर्शी और जांच योग्य हों। इससे साफ जाहिर होता है या तो बिजली चोरी के लिए उपभोक्ताओं को सरकार की ढीली प्रणाली प्रेरित कर रही है या फिर ईमानदार उपभोक्ताओं से ज्यादा वसूली कर बिजली चोरी की नुकसान भरपाई करने में लगी है।

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