आजादी की खुशियां मनाने को तो मिले स्पेशल बजट

    राजस्थान के सरकारी स्कूलों में स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए विशेष और निर्धारित बजट की जरूरत पर सवाल उठाए गए हैं। सीमित संसाधनों के कारण कई स्कूल सजावट, मिठाई और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए भामाशाहों पर निर्भर रहते हैं। सरकार को प्रत्येक स्कूल के खाते में समय पर पारदर्शी बजट देना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय पर्व सम्मान और गरिमा से मनाया जा सके।

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    आजादी के राष्ट्रीय पर्व की खुशियां चारों तरफ दिखाई दे रही हैं। तिरंगा फहराना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि नई पीढ़ी में देशभक्ति और जिम्मेदारी का भाव जगाने का माध्यम है। ऐसे में सवाल यह है कि सरकारी स्कूलों में 15 अगस्त का समारोह सम्मानजनक ढंग से आयोजित करने के लिए सरकार की ओर से कितना बजट उपलब्ध कराया जाता है? या फिर हर बार स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों को भामाशाहों की तलाश में ही जुटना पड़ेगा? राजस्थान में हजारों सरकारी स्कूल हैं। राज्य सरकार भी बड़े स्तर पर समारोहों की तैयारियां करती है , लेकिन सवाल उन छोटे सरकारी स्कूलों का है, जहां सीमित संसाधनों के बीच शिक्षक ही कार्यक्रम की व्यवस्था जुटाते हैं। कहीं मंच के लिए सहयोग मांगा जाता है, कहीं मिठाई के लिए, तो कहीं बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने को भामाशाहों का सहारा लिया जाता है। समाजसेवियों और दानदाताओं का सहयोग निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन राष्ट्रीय पर्व की बुनियादी व्यवस्था के लिए सरकारी स्कूलों को दूसरों के भरोसे छोड़ देना उचित नहीं कहा जा सकता।

    कई जगह शिक्षक और स्कूल प्रबंधन छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी सहयोग जुटाने को मजबूर दिखे। कहीं मिठाई तो कहीं सजावट और कार्यक्रम की सामग्री के लिए भामाशाह तलाशते स्कूली शिक्षक दिखे। भामाशाहों का सहयोग अच्छी बात है, लेकिन सरकारी व्यवस्था का विकल्प भामाशाह नहीं हो सकते। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती जैसे राष्ट्रीय पर्वों के लिए प्रत्येक सरकारी स्कूल को अलग वार्षिक समारोह बजट दिया जाना चाहिए। राशि सीधे स्कूल के खाते में पहुंचे और प्रधानाचार्य एवं स्कूल प्रबंधन समिति उसकी पारदर्शी तरीके से व्यवस्था करें। इससे न शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव पड़ेगा और न ही बच्चों के सामने सरकारी स्कूलों की आर्थिक मजबूरी दिखाई देगी। आखिर कब तक सरकारी स्कूलों के बच्चे यह देखते रहेंगे कि कार्यक्रम के लिए किसी भामाशाह की तलाश हो रही है? जिस शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार की है, उसके छोटे-छोटे खर्चों की जिम्मेदारी भी सरकार को ही उठानी होगी। भामाशाह सहयोग करें तो स्वागत है, लेकिन व्यवस्था उनके भरोसे नहीं चलनी चाहिए। सरकारी स्कूलों को सम्मानजनक ढंग से चलाने के लिए केवल बड़ी घोषणाएं नहीं, बल्कि हर स्कूल के लिए निश्चित, समय पर और उपयोगी बजट जरूरी है।

    यही सरकारी शिक्षा व्यवस्था को आत्मनिर्भर और मजबूत बनाने की दिशा में वास्तविक कदम होगा। सरकार यदि स्कूलों में शिक्षा, अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने की बात करती है तो स्वतंत्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण आयोजन के लिए प्रत्येक सरकारी स्कूल को स्पष्ट और पर्याप्त बजट उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कितनी राशि मिलेगी, किन मदों में खर्च होगी और उसका हिसाब कैसे रखा जाएगा—इसकी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। भामाशाहों का सहयोग अतिरिक्त सुविधाओं और नवाचारों के लिए लिया जा सकता है, लेकिन राष्ट्रीय पर्व मनाना सरकार की जिम्मेदारी है। आखिर जिस तिरंगे के नीचे सरकारी स्कूल के बच्चे देश के प्रति सम्मान का संकल्प लेते हैं, उस समारोह के लिए भी  सरकार को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। स्वतंत्रता दिवस केवल भाषण और ध्वजारोहण तक सीमित न रहे। बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि उनका स्कूल भी इस राष्ट्रीय पर्व को उतने ही सम्मान और गरिमा के साथ मनाता है, जितना कोई बड़ा सरकारी समारोह। इसके लिए बजट की स्पष्ट व्यवस्था हो, भामाशाह की मजबूरी नहीं। यह इसलिए भी पीड़ादायक है कि कहीं तो इन स्कूली बच्चों को आजादी की वर्षगाठ पर मिठाई तक नहीं मिल पाती। हम आजादी का उत्सव इस जुगाड़ से कब तक मनाते रहेंगे, इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।

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