सतर्कता बरतनी होगी, तभी प्रदूषण भी नहीं होगा और हादसे भी

    दिवाली पर पटाखों से होने वाले प्रदूषण और आगजनी के हादसों को रोकने के लिए ग्रीन पटाखों, बिक्री नियमों, सुरक्षा मानकों और प्रशासन की जवाबदेही पर ध्यान देना जरूरी है। सतर्कता और नियमों की पालना से ही त्योहार सुरक्षित और खुशहाल बन सकता है।

    0
    162

    दिवाली पर पटाखों के धमाकों के पहले प्रदूषण की चिंता का शोर मचता है। गाइड लाइन तय भी होती है, वक्त भी मुकर्रर किया जाता है। बावजूद सब धुएं में उड़ा दिया जाता है। आग से बढ़े हादसों की आशंका को भी हाशिए पर पटक दिया जाता है। दीपावली खुशियों का त्योहार है, लेकिन क्या खुशियां मनाने के नाम पर प्रदूषण फैलाने और नियमों की अनदेखी करने की छूट मिल जानी चाहिए? हर साल पटाखों की बिक्री, उनके इस्तेमाल और प्रदूषण को लेकर बहस होती है। अदालतों में सुनवाई होती है, ग्रीन पटाखों की अनुमति और प्रतिबंधों पर आदेश आते हैं, प्रशासन नियमों का पालन कराने का दावा करता है, लेकिन त्योहार आते ही सवाल फिर सामने खड़ा हो जाता है, आखिर नियमों की पालना क्यों नहीं होती? जब प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल रोकना है तो बाजारों में इन पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं दिखाई देता? पटाखों की बिक्री अपने आप में गलत नहीं कही जा सकती, यदि वह कानूनी अनुमति, निर्धारित मानकों और लागू प्रतिबंधों के दायरे में हो। लेकिन कारोबार की आड़ में नियमों को ताक पर रख देना कहां तक उचित है? दुकानदारों की जिम्मेदारी है कि वे प्रतिबंधित पटाखे न बेचें और खरीदारों को भी नियमों की जानकारी हो। इसके बावजूद यदि अवैध बिक्री होती है तो सवाल केवल दुकानदारों पर नहीं, निगरानी करने वाले तंत्र पर भी उठेंगे। आखिर लाइसेंस, जांच और बाजार की निगरानी किसलिए है?

    ग्रीन पटाखों को लेकर भी भ्रम की स्थिति नहीं रहनी चाहिए। इन्हें प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त समझना गलत है। इनसे भी प्रदूषण हो सकता है, भले ही निर्धारित मानकों वाले उत्पादों से कुछ उत्सर्जन कम हो। इसलिए ग्रीन पटाखों की अनुमति का मतलब यह नहीं कि हर तरह के पटाखे बेचे और चलाए जा सकते हैं। अदालत और प्रशासन ने जो शर्तें तय की हैं, उनका पालन अनिवार्य होना चाहिए। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है। जयपुर सहित राजस्थान के शहरों में प्रशासन को त्योहार से पहले ही बिक्री स्थलों की जांच करनी चाहिए। दुकानों पर बेचे जा रहे पटाखों के मानकों की पुष्टि हो, प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री पर निगरानी रखी जाए और आतिशबाजी के लिए लागू समय-सीमा का पालन कराया जाए। कार्रवाई केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अवैध बिक्री की जानकारी होने के बावजूद यदि जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे रहते हैं तो उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। यह तर्क भी दिया जाता है कि पटाखों से ही प्रदूषण नहीं होता। यह बात सही है कि वाहनों का धुआं, निर्माण स्थलों की धूल, कचरा जलाना और औद्योगिक उत्सर्जन भी प्रदूषण के बड़े स्रोत हैं। लेकिन दूसरे स्रोतों का हवाला देकर पटाखों से होने वाले प्रदूषण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन को सभी स्रोतों पर समान गंभीरता से काम करना होगा। केवल दीपावली के आसपास अभियान चलाकर बाद में सब कुछ पुराने ढर्रे पर छोड़ देना समाधान नहीं है।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नियम बनाए जाते हैं तो उनका पालन करना आखिर इतना मुश्किल क्यों हो जाता है? क्या व्यवस्था में निगरानी की कमी है, क्या कार्रवाई का डर नहीं है या फिर नियमों को लागू करने की इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है? इन सवालों के जवाब प्रशासन को देने होंगे। नागरिकों को भी यह समझना होगा कि त्योहार की खुशी दूसरों के स्वास्थ्य और अधिकारों की अनदेखी करके नहीं मनाई जा सकती। पटाखों की बिक्री कारोबार का विषय हो सकती है, लेकिन जनस्वास्थ्य उससे कहीं बड़ा सवाल है। सरकार को न तो बिना सोचे-समझे हर बिक्री को अपराध मानना चाहिए और न ही नियमों के उल्लंघन पर आंखें मूंदनी चाहिए। स्पष्ट नियम, पारदर्शी अनुमति, प्रभावी निगरानी और उल्लंघन पर कार्रवाई-यही सही रास्ता है। हर साल प्रतिबंधों का शोर मचाने से बेहतर है कि ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें नियम केवल कागजों पर नहीं, बाजारों और सड़कों पर भी दिखाई दें। पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण का असर केवल कुछ घंटों तक सीमित नहीं रहता। हवा की गुणवत्ता पहले से खराब हो तो आतिशबाजी की समस्या और गंभीर हो सकती है। बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी परेशानी से जूझ रहे लोगों के लिए यह धुआं खास तौर पर मुश्किल पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, तेज आवाज से लोगों के साथ पशु-पक्षी भी प्रभावित होते हैं। ऐसे में त्योहार मनाने की स्वतंत्रता और दूसरों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। विडंबना यह है कि हर साल जागरूकता अभियान चलाने के बावजूद प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री, निर्धारित समय के उल्लंघन और असुरक्षित तरीके से आतिशबाजी की आशंका बनी रहती है। ग्रीन पटाखों की अनुमति का अर्थ यह नहीं कि प्रदूषण पूरी तरह खत्म हो जाएगा या उन्हें कहीं भी और कभी भी चलाया जा सकता है। उनके इस्तेमाल पर भी लागू निर्देशों का पालन जरूरी है। प्रशासन की जिम्मेदारी केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं हो सकती। सबसे पहले बिक्री पर निगरानी जरूरी है। पटाखे बेचने वालों को लाइसेंस, सुरक्षा मानकों और निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा। अस्थायी दुकानों में आग से बचाव के इंतजाम, सुरक्षित दूरी, अग्निशमन उपकरण और आपातकालीन निकास की व्यवस्था होनी चाहिए। भीड़भाड़ वाले बाजारों, संकरी गलियों और घनी आबादी के बीच पटाखों के भंडारण को लेकर विशेष सतर्कता बरतनी होगी।
     

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.