मुहाना मंडी में छापेमारी के दौरान अचार के ड्रमों में छिपकलियां और मच्छर मिलने की खबर खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर संदेह खड़ा कर रही है। अचार जैसी रोजमर्रा की खाद्य सामग्री में इस तरह की गंदगी मिलने का मामला केवल मिलावट का नहीं, बल्कि लोगों की सेहत और सरकारी निगरानी व्यवस्था की जवाबदेही का भी है। आखिर आम आदमी की थाली तक पहुंचने वाले खाद्य पदार्थों की जांच का जिम्मा संभालने वाला महकमा पूरे साल क्या करता है? मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई की याद दीपावली जैसे त्योहारों पर ही क्यों आती है? दीपावली आते ही मिठाइयों, मावे, घी, तेल, मसालों और अन्य खाद्य पदार्थों की जांच के लिए अभियान शुरू हो जाते हैं। जगह-जगह छापे पड़ते हैं, नमूने लिए जाते हैं और संदिग्ध सामग्री जब्त करने की खबरें सामने आती हैं। कुछ दिनों तक विभाग की सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन त्योहार गुजरते ही यह मुहिम भी अक्सर सुस्त पड़ती नजर आती है। क्या मिलावट का कारोबार केवल त्योहारों के दौरान ही होता है? क्या आम दिनों में लोगों की सेहत की कोई अहमियत नहीं है? मिलावटखोरों के लिए भी यह व्यवस्था एक तरह का संकेत बन जाती है कि कुछ दिन सतर्क रहो, फिर कामकाज पुराने ढर्रे पर चलने लगेगा।
मुहाना मंडी में अचार के ड्रमों में छिपकलियां और मच्छर मिलने का मामला खाद्य पदार्थों की स्वच्छता और भंडारण व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगा रहा है। खाद्य सामग्री तैयार करने से लेकर उसे पैक करने, गोदामों में रखने और बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया में साफ-सफाई के नियमों का पालन अनिवार्य होना चाहिए। यदि किसी प्रतिष्ठान में इतनी गंभीर लापरवाही सामने आती है तो यह भी जांच होनी चाहिए कि वहां नियमित निरीक्षण हुआ था या नहीं। लाइसेंस और पंजीकरण देने के बाद विभाग की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। असली जिम्मेदारी तो यह सुनिश्चित करने की है कि लोगों को खाने के नाम पर असुरक्षित सामग्री न परोसी जाए।
कार्रवाई के बाद सजा का भी भगवान मालिक है। छापा पड़ने, खाद्य सामग्री जब्त होने और नमूने लेने से ही जनता को राहत नहीं मिल सकती। कार्रवाई का वास्तविक परिणाम तब सामने आएगा, जब जांच समय पर पूरी हो, दोषियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़े और गंभीर उल्लंघन करने वालों को नियमानुसार दंड मिले। यदि हर साल छापे पड़ते रहें और मिलावट का कारोबार भी चलता रहे तो इन अभियानों की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विभाग को यह भी बताना चाहिए कि पिछले अभियानों में कितने मामलों में दोष साबित हुए, कितने मामलों में अभियोजन चला और कितने दोषियों को सजा मिली। यह भी जरूरी है कि हर मामले में दोष तय करने की प्रक्रिया निष्पक्ष और साक्ष्य आधारित हो। केवल छापा पड़ने को अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं माना जा सकता। लेकिन जहां जांच में खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां कार्रवाई को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना भी उचित नहीं है। नमूनों की जांच, रिपोर्ट तैयार करने और मुकदमों के निस्तारण के लिए समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। खाद्य सुरक्षा कानूनों के तहत जहां जुर्माना पर्याप्त है, वहां जुर्माना लगाया जाए और जहां अपराध की गंभीरता के अनुसार कठोर दंड का प्रावधान है, वहां उसका प्रभावी इस्तेमाल किया जाए।
सरकार और संबंधित विभागों को त्योहारों के नाम पर चलने वाले औपचारिक अभियानों से आगे बढ़ना होगा। खाद्य निर्माण इकाइयों, गोदामों, थोक मंडियों और खुदरा दुकानों का जोखिम के आधार पर नियमित निरीक्षण किया जाए। बार-बार नियम तोड़ने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं। जांच के परिणाम और कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक की जाए, ताकि लोगों को पता चले कि छापेमारी के बाद मामला कहां तक पहुंचा। विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। यदि किसी प्रतिष्ठान में लगातार गंभीर अनियमितताएं मिलती हैं तो यह पड़ताल जरूरी है कि निगरानी में चूक कहां हुई। दीपावली खुशियों का त्योहार है, लेकिन मिलावट और गंदगी से भरे खाद्य पदार्थ इन खुशियों को बीमारी में बदल सकते हैं। आम आदमी बाजार से सामान खरीदते समय यह भरोसा करता है कि संबंधित विभाग उसकी सुरक्षा के लिए मौजूद है। इस भरोसे को कायम रखना केवल छापेमारी की संख्या बढ़ाने से संभव नहीं है। इसके लिए पूरे साल निगरानी, पारदर्शी जांच, समय पर मुकदमे और दोषियों को दंडित करने की व्यवस्था जरूरी है। आखिर खाद्य सुरक्षा विभाग की सक्रियता का पैमाना त्योहारों पर होने वाली छापेमारी नहीं, बल्कि पूरे साल मिलावट पर लगाम और दोषियों के खिलाफ होने वाली ठोस कार्रवाई होनी चाहिए। जब तक कार्रवाई का डर नहीं होगा, तब तक मिलावट का धंधा करने वालों पर प्रभावी अंकुश लगाना मुश्किल रहेगा। छापे तो हर साल पड़ते हैं, लेकिन मिलावट का कारोबार कब थमेगा और दोषियों को सजा कब मिलेगी?



