दीपावली की तैयारी चल रहा है। हर घर में सफाई हो रही है। लोग अपने घरों को सजाने में जुटे हैं, लेकिन घरों से निकलने वाला कचरा सड़कों पर ढेर बनकर जमा हो रहा है। जयपुर ही नहीं, राजस्थान के दूसरे शहरों में भी यही तस्वीर नजर आ रही है। एक तरफ घरों में स्वच्छता का उत्सव है, दूसरी तरफ सड़कों पर गंदगी का अंबार। त्योहारों पर सफाई की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। बाजारों में भीड़ बढ़ती है, खरीदारी तेज होती है और कचरा सामान्य दिनों के मुकाबले अधिक निकलता है। ऐसे में नगर निगमों और स्थानीय निकायों को पहले से विशेष व्यवस्था करनी चाहिए। अतिरिक्त सफाईकर्मी तैनात हों, कचरा संग्रहण के वाहन नियमित पहुंचें और कचरे के ढेर तत्काल उठाए जाएं। लेकिन यदि त्योहार के समय भी सड़कों पर कचरा जमा है तो सफाई व्यवस्था के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विडंबना यह है कि स्वच्छता के नाम पर अभियान चलाने, जागरूकता संदेश देने और बड़े-बड़े दावे करने में कोई कमी नहीं दिखती, लेकिन जमीन पर व्यवस्था का हाल अक्सर अलग नजर आता है। आखिर निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है? क्या अधिकारियों को यह पता नहीं कि किन इलाकों में कचरा नियमित नहीं उठ रहा? क्या सफाई व्यवस्था की समीक्षा केवल कागजों पर होती है? जयपुर जैसे बड़े शहर में यदि यह स्थिति है तो दूसरे शहरों की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। सफाई केवल जनता की जिम्मेदारी नहीं है। नागरिकों को भी कचरा निर्धारित स्थान पर डालना चाहिए, लेकिन कचरा उठाने और उसका उचित निस्तारण करने की जवाबदेही नगर निकायों की है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि त्योहारों के दौरान सफाई व्यवस्था बाधित न हो। लापरवाही करने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। दीपावली पर घरों में लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी है, लेकिन सड़कों पर गंदगी का स्वागत कौन कर रहा है? स्वच्छ शहरों के दावे तभी सार्थक होंगे, जब त्योहार के दिन भी आम आदमी को अपने आसपास साफ-सुथरा वातावरण मिले। सवाल सिर्फ कचरे के ढेर का नहीं, सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही का भी है। आखिर सफाई के नाम पर अभियान कब तक चलेंगे और सड़कों पर गंदगी कब तक दिखाई देती रहेगी?
चुनाव के समय घर-घर जाकर हाथ जोड़ने वाले पार्षद अब नजर नहीं आ रहे। तब हर गली, हर मोहल्ले में पहुंचकर समस्याएं सुनने और समाधान कराने के वादे किए जा रहे थे। जनता ने भरोसा करके उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना, लेकिन अब जब दीपावली पर सड़कों पर कचरे के ढेर लगे हैं, सफाई व्यवस्था बिगड़ी हुई है और लोग परेशान हैं, तो आखिर वे पार्षद कहां हैं? क्या चुनाव जीतने के बाद उनकी जिम्मेदारियां खत्म हो गईं? जयपुर ही नहीं, दूसरे शहरों में भी सफाई और नागरिक सुविधाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में पार्षदों की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। उन्हें अपने वार्ड की स्थिति का जायजा लेना चाहिए, सफाईकर्मियों की व्यवस्था देखनी चाहिए और नगर निगम के अधिकारियों से जवाब मांगना चाहिए। आखिर वार्ड की समस्याओं को उठाने और उनका समाधान कराने की जिम्मेदारी उन्हीं की है। पार्षद का पद केवल अभिनंदन कराने, माला पहनने और स्वागत समारोहों में शामिल होने के लिए नहीं है। जनता ने उन्हें अपने क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए चुना है। सड़कें टूटी हों, नालियां भरी हों, कचरा जमा हो या स्ट्रीट लाइटें बंद हों—इन सब पर उनकी जवाबदेही बनती है। बजट की कमी या अधिकारियों की लापरवाही का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचना आसान है, लेकिन जनता को आखिर राहत कौन देगा?



