कोटा में सीजेरियन के बाद एक और प्रसूता की मौत हो गई। केवल नौ दिनों के भीतर कोटा में यह तीसरी प्रसूता की मौत हुई है। 16 अक्टूबर को न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रेशमा तो अगले दिन रोशन बैरवा ने दम तोड़ा। वहीं अब 23 अक्टूबर को सीजेरियन प्रसव के बाद जेके लोन अस्पताल में शबनम बानो की जान चली गई। यहां भी परिजनों ने उपचार में लापरवाही के आरोप लगाए हैं, जबकि अस्पताल प्रशासन ने आरोपों से इनकार किया है। सीजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की मौतों की बार-बार सामने आ रही घटनाएं स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी हैं। कोटा से शुरू हुआ मामला बीकानेर, जोधपुर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा तक पहुंचा। मई से जुलाई के दौरान अलग-अलग सरकारी अस्पतालों में प्रसव के बाद महिलाओं की मौतें हुईं और कई दूसरी प्रसूताओं की हालत गंभीर हुई। जुलाई में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, इन घटनाओं से जुड़े मामलों में राज्य में कुल 18 मातृ मौतों का आंकड़ा सामने आया था। इसी साल मई में कोटा के अस्पताल में सीजेरियन प्रसव के बाद कई महिलाओं की किडनी प्रभावित होने और पांच प्रसूताओं की मौत के मामले सामने आए थे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन सभी घटनाओं के पीछे एक ही कारण है? अब तक सामने आई जांच संबंधी जानकारियां बताती हैं कि ऐसा मानना सही नहीं होगा। कहीं अत्यधिक रक्तस्राव, कहीं रक्त का थक्का जमने से फेफड़ों तक रक्त पहुंचने में रुकावट, कहीं गंभीर संक्रमण और कहीं पहले से मौजूद बीमारी मौत की वजह बनी। इसके बावजूद अस्पतालों में मरीजों की निगरानी, संक्रमण नियंत्रण, दवाओं की गुणवत्ता और उपचार के रिकॉर्ड को लेकर उठे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रसव के बाद महिलाओं की मौतों का सिलसिला स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सीजेरियन ऑपरेशन अपने आप में मौत का कारण नहीं है, लेकिन ऑपरेशन के बाद मरीज की लगातार निगरानी, रक्तस्राव पर नियंत्रण, संक्रमण से बचाव और आपातकालीन उपचार की उपलब्धता जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकती है। कोटा में मई में हुई मौतों के बाद जांच हुई, दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठे और अस्पताल की व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई। इसके बावजूद अक्टूबर में फिर तीन प्रसूताओं की मौत हो गई। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि हाल की मौतों के कारण मई की घटनाओं से अलग हैं। यदि ऐसा है तो भी सवाल बना रहता है कि हर मामले में जोखिम की पहचान और समय पर उपचार कितना प्रभावी रहा।
विडंबना यह है कि ऐसी घटनाओं के बाद जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट मांगी जाती है और कार्रवाई के आश्वासन दिए जाते हैं। लेकिन जनता यह जानना चाहती है कि इन जांचों से अस्पतालों की व्यवस्था में कितना सुधार हुआ। यदि पहले की घटनाओं के बाद कमियां दूर की गई थीं, तो ऐसी घटनाएं दोबारा क्यों सामने आ रही हैं? यह जरूरी नहीं कि हर मौत चिकित्सकीय लापरवाही से हुई हो, लेकिन हर मौत की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। सरकार को केवल जिम्मेदारी तय करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सरकारी अस्पतालों में इलाज के दौरान किसी मरीज की जान बचाने के लिए जरूरी संसाधनों की कमी न हो।
अस्पताल प्रशासन की जवाबदेही केवल ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर तक सीमित नहीं हो सकती। ऑपरेशन के बाद मरीज की निगरानी, समय पर जांच, दवाओं की उपलब्धता, रक्त की व्यवस्था और आपात स्थिति में विशेषज्ञ उपचार सुनिश्चित करना भी पूरी चिकित्सा टीम और प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि व्यवस्था में खामी है, तो केवल किसी एक कर्मचारी पर कार्रवाई करके बाकी जिम्मेदार अधिकारियों को बचाना भी उचित नहीं होगा। सरकार को प्रसूताओं की मौत के प्रत्येक मामले की समयबद्ध और निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। जांच में दोषी पाए जाने वाले डॉक्टरों, नर्सिंग कर्मियों या संबंधित अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, अस्पतालों में स्टाफ की कमी, संसाधनों के अभाव और काम के अत्यधिक दबाव जैसी समस्याओं की भी पड़ताल होनी चाहिए। व्यवस्था की खामियों को दूर किए बिना केवल निलंबन से स्थायी सुधार नहीं होगा।



