राज्य के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में मरीजों को समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा। डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी बनी हुई है और मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया जा रहा है। छोटे शहरों और कस्बों के अस्पतालों में गंभीर मरीज पहुंचते ही उन्हें बड़े अस्पतालों में भेजने की सलाह मिल जाती है। कहीं विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं, कहीं जांच की सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं, तो कहीं जरूरी उपकरण होने के बावजूद उनका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। नतीजा यह है कि मरीज और उनके परिजन इलाज के लिए जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर जैसे बड़े शहरों की ओर दौड़ लगाने को मजबूर होते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह परेशानी और भी बड़ी हो जाती है। एम्बुलेंस का खर्च, आने-जाने की दिक्कत और समय पर उपचार न मिलने का खतरा उनकी मुश्किलें बढ़ा देता है।
सोचने की बात यह है कि सरकारी अस्पताल आखिर रेफरल सेंटर बनकर क्यों रह गए हैं? हर गंभीर मरीज को बड़े अस्पताल में भेज देना क्या समस्या का समाधान है? रेफर करना चिकित्सा व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है, लेकिन जब सामान्य बीमारियों और ऐसी स्थितियों में भी मरीजों को दूसरे अस्पतालों का रास्ता दिखाया जाए, जिनका उपचार स्थानीय स्तर पर संभव होना चाहिए, तो व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मरीज सरकारी अस्पताल इस उम्मीद में पहुंचता है कि उसे कम खर्च में बेहतर इलाज मिलेगा। अगर वहां से उसे केवल दूसरे अस्पताल जाने की सलाह मिलती है, तो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की उपयोगिता पर सवाल खड़े होंगे ही।
हालात ऐसे हैं कि मामूली दुर्घटना में घायल मरीज को भी कई बार बड़े अस्पताल के लिए रेफर कर दिया जाता है। कहीं न्यूरो सर्जन उपलब्ध नहीं है तो कहीं एमआरआई जैसी जरूरी जांच की सुविधा नहीं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर आधी-अधूरी सुविधाओं वाले जिला अस्पताल मरीजों का पूरा इलाज कैसे कर पाएंगे? जिला अस्पताल किसी भी क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। इनसे उम्मीद की जाती है कि दुर्घटना में घायल होने, अचानक तबीयत बिगड़ने या किसी गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीज को तत्काल और समुचित उपचार मिल सकेगा। हर मरीज को जयपुर या किसी अन्य बड़े शहर तक नहीं दौड़ना पड़ेगा। लेकिन जब जिला अस्पताल में पहुंचने के बाद मरीज को यह पता चलता है कि जरूरी जांच यहां नहीं हो सकती या संबंधित विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं, तो उसके सामने दूसरे अस्पताल में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य यदि मरीज को उसके नजदीक इलाज उपलब्ध कराना है, तो यह स्थिति चिंता पैदा करती है।
सड़क दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति को समय पर उपचार मिलना बेहद महत्वपूर्ण होता है। सिर में चोट लगने या न्यूरोलॉजिकल समस्या की आशंका होने पर विशेषज्ञ की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में जिला अस्पताल में न्यूरो सर्जन नहीं होने या आवश्यक जांच उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीज को दूसरे केंद्र पर भेजना पड़ सकता है। हर रेफरल को लापरवाही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कुछ मरीजों को उच्चस्तरीय चिकित्सा केंद्र की जरूरत होती है। लेकिन यदि जरूरी प्राथमिक उपचार और समय पर निर्णय लेने की व्यवस्था भी कमजोर हो, तो मरीज की परेशानी और जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं। सवाल यह है कि जिला अस्पतालों में आपातकालीन चिकित्सा की ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए, जिससे मरीज को स्थिर करने और जरूरी उपचार शुरू करने में देरी न हो? एमआरआई जैसी जांच की सुविधा का अभाव भी मरीजों के लिए मुश्किलें पैदा करता है। हालांकि हर जिला अस्पताल में हर तरह की महंगी जांच की व्यवस्था करना व्यावहारिक नहीं हो सकता, लेकिन जहां मरीजों की संख्या और चिकित्सा जरूरत अधिक है, वहां आवश्यक जांच सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। जिन अस्पतालों में यह सुविधा नहीं है, वहां जांच के लिए दूसरे केंद्र तक पहुंचाने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। केवल रेफर कर देना पर्याप्त नहीं है। मरीज को कहां जाना है, वहां उपचार उपलब्ध है या नहीं, उसे कितनी जल्दी पहुंचाया जा सकता है और बीच में उसकी देखभाल कैसे होगी- इन सबका जवाब भी अस्पताल की जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए।
एक्सीडेंट नहीं, हार्ट समेत अन्य बीमारियों के इलाज की प्राथमिक व्यवस्था तक इन जिला अस्पतालों में मौजूद नहीं है। मेडिकल कॉलेज खोलने का उद्देश्य सिर्फ डॉक्टर तैयार करना नहीं, बल्कि संबंधित क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करना भी होना चाहिए। मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, आधुनिक जांच उपकरण, ऑपरेशन थिएटर, दवाइयां और गंभीर मरीजों के उपचार की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकार को यह भी देखना होगा कि नए मेडिकल कॉलेजों के आसपास के जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति क्या है। क्या वहां पर्याप्त विशेषज्ञ चिकित्सक हैं? क्या मरीजों की जरूरी जांच समय पर हो रही है? क्या प्रसव, दुर्घटना और अन्य आपात स्थितियों में तत्काल उपचार मिल रहा है? क्या मरीजों को जरूरी दवाइयां अस्पताल में ही उपलब्ध हो रही हैं? इन सवालों का जवाब केवल बैठकों और समीक्षा रिपोर्टों से नहीं, बल्कि अस्पतालों की वास्तविक स्थिति के आकलन से मिलना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि प्रदेश में कितने मेडिकल कॉलेज खुल गए या कितने बिस्तर बढ़ा दिए गए। असली कसौटी यह है कि कितने मरीजों को समय पर उपचार मिला, कितने अस्पतालों में विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित हुई, कितने मरीजों को अनावश्यक रेफरल से राहत मिली और गंभीर रोगियों की जान बचाने के लिए कितनी प्रभावी व्यवस्था विकसित हुई। सरकार को रेफरल के आंकड़ों का भी विश्लेषण करना चाहिए। किन अस्पतालों से कितने मरीज रेफर हुए, किन बीमारियों में रेफरल की जरूरत पड़ी और किन मामलों में स्थानीय स्तर पर इलाज संभव था- इसकी नियमित समीक्षा होनी चाहिए। यह भी समझना होगा कि हर मरीज को बड़े अस्पताल में भेजना वहां की व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालता है। पहले से मरीजों के बोझ से जूझ रहे बड़े सरकारी अस्पतालों में लंबी कतारें, जांच में देरी और बिस्तरों की कमी जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। यदि जिला और उप जिला स्तर के अस्पतालों को मजबूत किया जाए, तो मरीजों को उनके नजदीक ही उपचार मिल सकता है और बड़े अस्पतालों पर अनावश्यक दबाव भी कम होगा।



