तकरीबन करीब आठ साल से खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को पुरस्कार नहीं मिल रहे। राजस्थान में खिलाड़ियों के लिए महाराणा प्रताप पुरस्कार और प्रशिक्षकों के लिए गुरु वशिष्ठ पुरस्कार राज्य के प्रमुख खेल सम्मान हैं। इन पुरस्कारों का उद्देश्य खेल प्रतिभाओं और प्रशिक्षकों के योगदान को पहचान देना है। लेकिन वर्ष 2017-18 के बाद से इन राज्य स्तरीय पुरस्कारों का नियमित वितरण नहीं हो पाने की स्थिति ने खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों की चिंता बढ़ाई है। अगस्त 2025 में भी राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर पुरस्कारों की घोषणा नहीं हो सकी थी। उस समय 481 खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के आवेदन लंबित होने की बात सामने आई थी। सवाल है कि आखिर इतने आवेदन लंबित क्यों हैं और इनके निस्तारण की जिम्मेदारी किसकी है?
अर्जुन पुरस्कार खिलाड़ियों को और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रशिक्षकों को दिए जाने वाले राष्ट्रीय सम्मान हैं, जबकि महाराणा प्रताप और गुरु वशिष्ठ पुरस्कार राजस्थान सरकार के सम्मान हैं। दोनों स्तरों पर पुरस्कारों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता जरूरी है। किसी भी स्तर पर देरी होती है तो उसका कारण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। पुरस्कारों में देरी के पीछे चयन प्रक्रिया, दस्तावेजों की जांच, प्रशासनिक मंजूरी या अन्य कारण हो सकते हैं, लेकिन जब तक विभाग आधिकारिक रूप से कारण नहीं बताता, तब तक किसी एक वजह को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सरकार और खेल विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आवेदन किस स्तर पर अटके हैं, चयन प्रक्रिया कहां तक पहुंची है और सम्मान समारोह कब आयोजित किया जाएगा। केवल आश्वासन देकर खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को इंतजार कराते रहना उचित नहीं है। खेलों को बढ़ावा देने के लिए सरकारें नई योजनाओं, प्रतियोगिताओं और सुविधाओं की घोषणाएं करती हैं। खेल अकादमियों, स्टेडियमों और प्रशिक्षण केंद्रों पर भी ध्यान दिया जाता है। लेकिन खेल नीति की सफलता केवल बजट खर्च करने या पदकों के आंकड़े गिनाने से नहीं मापी जा सकती। खिलाड़ियों को समय पर सुविधाएं, प्रशिक्षकों को उचित संसाधन और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों को सम्मान देना भी उतना ही आवश्यक है। सम्मान मिलने से खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ता है और नई पीढ़ी को खेलों में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
इस मामले में खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों की नाराजगी को महज पुरस्कार नहीं मिलने की शिकायत मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। उनके लिए यह सम्मान वर्षों की मेहनत, संघर्ष और उपलब्धियों की पहचान है। पुरस्कार मिलने से आर्थिक लाभ के अलावा सामाजिक प्रतिष्ठा और आगे बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा भी मिलती है। जब यही पहचान वर्षों तक अटकी रहे, तो निराशा बढ़ना स्वाभाविक है। खासकर उन खिलाड़ियों के लिए, जिन्होंने अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर सम्मान की उम्मीद की थी। लंबे समय से लंबित पुरस्कारों के कारण योग्य खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के सामने अनिश्चितता बनी रहती है। किसी खिलाड़ी ने वर्षों पहले उत्कृष्ट प्रदर्शन किया हो, लेकिन उसके योगदान को समय पर मान्यता नहीं मिले, तो पुरस्कार का महत्व प्रभावित होता है। प्रशिक्षकों के साथ भी यही स्थिति है। वे पर्दे के पीछे रहकर प्रतिभाओं को तैयार करते हैं। उनके योगदान की उपेक्षा करना खेल विकास की पूरी प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है। सरकार को अब इस मामले में ठोस कदम उठाने चाहिए। लंबित आवेदनों की स्थिति सार्वजनिक की जाए, चयन प्रक्रिया पूरी करने के लिए समयसीमा तय हो और भविष्य में पुरस्कार नियमित रूप से दिए जाने की व्यवस्था बने। यदि किसी स्तर पर अनावश्यक देरी हो रही है तो जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। पुरस्कारों का चयन निष्पक्ष हो, लेकिन निष्पक्षता के नाम पर प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक नहीं खिंचनी चाहिए।
राजस्थान में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जो उनकी मेहनत को पहचाने और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दे। खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को सम्मान के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़े, यह स्थिति बदलनी ही चाहिए। सरकार को बताना होगा कि खेल प्रतिभाओं का सम्मान उसकी प्राथमिकता है या केवल समारोहों और घोषणाओं तक सीमित विषय। मैदान में मेहनत करने वालों को समय पर सम्मान मिलना चाहिए, न कि सरकारी फाइलों के खुलने का इंतजार।



