पटाखों से फैलने वाले प्रदूषण पर बहस फिर से शुरू हो गई है। ग्रीन पटाखों की बिक्री के अलावा अन्य जरूरी दिशा-निर्देश हर बार की तरह इस बार भी जारी किए जाएंगे। सावधानी भी बताई जाएंगी और पाबंदी भी। हालांकि पालना कितनी होगी, इस पर हमेशा की तरह संशय बरकरार है। दीपावली आते ही पटाखों से होने वाले प्रदूषण को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ जाती है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया जाता है, ग्रीन पटाखे चलाने की सलाह दी जाती है और आतिशबाजी के लिए रात 10 बजे तक की समय सीमा तय की जाती है। प्रशासन भी आदेशों की पालना कराने के दावे करता है। लेकिन हकीकत इससे अलग नजर आती है। न ग्रीन पटाखों की शर्त का पूरी तरह पालन होता है और न ही निर्धारित समय सीमा की। रातभर आतिशबाजी होती रहती है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर अदालत के निर्देशों की पालना कौन कराएगा?
पटाखों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए हर साल सरकारी स्तर पर खूब कवायद होती है। जयपुर से लेकर प्रदेश के दूसरे बड़े शहरों तक प्रशासन बैठकें करता है, दिशा-निर्देश जारी होते हैं और लोगों से ग्रीन पटाखे चलाने की अपील की जाती है। क्या जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर और बीकानेर जैसे शहरों में प्रदूषण रोकने के लिए कोई ठोस और प्रभावी व्यवस्था की गई है या फिर हर बार की तरह इस बार भी सरकारी इंतजाम कागजों तक ही सीमित हैं? पटाखों से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी परेशानियों से जूझ रहे लोगों पर पड़ता है। इसके बावजूद पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रभावी निगरानी का अभाव दिखाई देता है। ग्रीन पटाखों के नाम पर सामान्य पटाखों की बिक्री की शिकायतें उठती हैं। आम खरीदार के लिए यह पहचानना भी आसान नहीं कि बाजार में बिक रहा पटाखा वास्तव में निर्धारित मानकों पर खरा उतरता है या नहीं। ऐसे में सवाल है कि दुकानों पर जांच की जिम्मेदारी निभाने वाले विभाग कितने सक्रिय हैं?
आतिशबाजी के लिए निर्धारित समय सीमा का भी अक्सर उल्लंघन होता है। रात 10 बजे तक पटाखे चलाने के निर्देश के बावजूद कई इलाकों में देर रात तक धमाके सुनाई देते हैं। पुलिस और प्रशासन की निगरानी के बावजूद ऐसा होता है तो उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। केवल त्योहार से पहले अपील जारी करना और नियमों की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई भी दिखाई दे। प्रदूषण नियंत्रण मंडल की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। शहरों में दीपावली से पहले और बाद की वायु गुणवत्ता के आंकड़े सार्वजनिक होने चाहिए। इससे पता चल सकेगा कि प्रदूषण का स्तर कितना बढ़ा और सरकारी इंतजाम कितने कारगर रहे। नगर निकायों को भी सफाई, धूल नियंत्रण और कचरा प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पटाखों का प्रदूषण रोकने की योजना केवल पुलिस या प्रदूषण नियंत्रण मंडल के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। इसमें जिला प्रशासन, स्थानीय निकायों और आम नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।
यह भी समझना होगा कि त्योहार मनाने की खुशी किसी दूसरे के लिए परेशानी का कारण नहीं बननी चाहिए। आतिशबाजी पर नियंत्रण का उद्देश्य परंपराओं को रोकना नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा करना है। नागरिकों को भी नियमों का पालन करना होगा और अनावश्यक आतिशबाजी से बचना होगा। अब जरूरत हर साल होने वाली औपचारिक बैठकों से आगे बढ़ने की है। जयपुर समेत प्रदेश के सभी शहरों में पटाखों की बिक्री, उनकी गुणवत्ता, इस्तेमाल के समय और प्रदूषण के स्तर की नियमित निगरानी होनी चाहिए। प्रशासन को यह भी बताना चाहिए कि कितनी जांच हुई, कितने उल्लंघन मिले और कितने लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई। आखिर प्रदूषण रोकने के नाम पर हर साल निर्देश जारी होते हैं, लेकिन यदि हवा फिर जहरीली होती है तो इन इंतजामों की समीक्षा कौन करेगा? जनता को आश्वासन नहीं, साफ हवा चाहिए। पटाखों की दुकानों पर जिस तरह बिक्री होती है, उससे भी नियमों की निगरानी पर सवाल खड़े होते हैं। ग्रीन पटाखों के नाम पर दूसरे पटाखों की बिक्री की शिकायतें सामने आती हैं। आम खरीदार के लिए यह पहचानना भी मुश्किल होता है कि वह जो पटाखा खरीद रहा है, वह वास्तव में ग्रीन पटाखा है या नहीं। बिक्री के समय जांच और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है? क्या संबंधित विभागों के पास इसकी कोई प्रभावी व्यवस्था है? यदि नियमों के विपरीत पटाखे बिक रहे हैं तो कार्रवाई केवल औपचारिक जांच तक क्यों सीमित रह जाती है?सरकार और प्रशासन को यह तय करना होगा कि नियमों की पालना कराने की जिम्मेदारी किसकी है। पटाखों की दुकानों की नियमित जांच हो, प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री पर रोक लगे, ग्रीन पटाखों की प्रमाणिकता सुनिश्चित की जाए और निर्धारित समय के बाद आतिशबाजी करने वालों पर कार्रवाई हो। केवल आदेश जारी करने से प्रदूषण नहीं रुकेगा। इसके लिए निगरानी, जवाबदेही और दंडात्मक कार्रवाई जरूरी है।हर साल दिवाली पर वही निर्देश, वही अपील और वही उल्लंघन। आखिर कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा? प्रदूषण पर नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल कागजों में नहीं, जमीन पर दिखाई देनी चाहिए। जब सरकारी दिशा-निर्देशों का ही पालन नहीं होगा तो पटाखों पर पाबंदी और स्वच्छ हवा का सपना कैसे पूरा होगा?



