जयपुर। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में गांव की सरकार चुनने की बेताबी बढ़ती जा रही है, लेकिन पंचायत चुनावों की तारीखों को लेकर सस्पेंस अभी भी बरकरार है। तमाम कयासों के बीच यह लगभग तय हो गया है कि आज भी चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं होगा और अब इसके लिए अक्टूबर महीने का इंतजार करना पड़ेगा। दूसरी ओर, चुनाव की घोषणा से ठीक पहले राजधानी जयपुर की सियासत गरमा गई है। निकाय चुनावों में कथित धांधली और पुलिस-प्रशासन के दबाव के खिलाफ प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने राज्य निर्वाचन आयोग के दफ़्तर का रुख किया है।
क्यों टल रहा है तारीखों का ऐलान? नवंबर में मतदान की संभावना
राजस्थान हाईकोर्ट के कड़े रुख और 15 नवंबर तक पूरी चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराने के सख्त निर्देशों के बाद से प्रशासनिक महकमा एक्शन मोड में है। राज्य निर्वाचन आयोग फिलहाल जमीनी तैयारियों, वार्डों के परिसीमन और आरक्षण के अंतिम परीक्षण में जुटा हुआ है।
चूंकि तारीखों का औपचारिक ऐलान आज टल गया है, ऐसे में माना जा रहा है कि अक्टूबर के शुरुआती दिनों में शेड्यूल जारी हो सकता है। हाईकोर्ट की समयसीमा को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रदेश में नवंबर के पहले या दूसरे सप्ताह में मतदान कराए जा सकते हैं।
कितना बड़ा होगा इस बार का चुनाव?
आयोग की रूपरेखा के मुताबिक, इस बार त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 4 चरणों में संपन्न होंगे। प्रदेशभर में कुल 1,40,237 वार्ड सदस्यों और 14,403 सरपंच पदों पर चुनाव होना है:
- जिला परिषद: 1,403 वार्ड सदस्य मिलकर 41 जिला प्रमुखों का चुनाव करेंगे।
- पंचायत समिति: 8,245 वार्ड सदस्य 457 प्रधानों की ताजपोशी तय करेंगे।
निकाय चुनाव के बाद अब पंचायत चुनाव में भी साजिश का आरोप: आयोग पहुँची कांग्रेस
एक तरफ चुनाव की तारीखों का इंतजार हो रहा है, तो दूसरी तरफ मंगलवार को पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के नेतृत्व में कांग्रेस का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल राज्य निर्वाचन आयोग जा पहुँचा।
इस दौरान उनके साथ सांसद मुरारीलाल मीणा, विधायक रफीक खान, पूर्व मंत्री डॉ. बीडी कल्ला और पूर्व विधायक संयम लोढ़ा समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। आयोग के बाहर मीडिया से मुखातिब होते हुए कांग्रेस नेताओं ने गंभीर आरोप लगाए कि सरकार के इशारे पर निकाय चुनावों की तर्ज पर अब पंचायत चुनावों में भी कांग्रेस उम्मीदवारों को रोकने की साजिश रची जा रही है और निष्पक्ष अधिकारियों-कर्मचारियों पर दबाव बनाया जा रहा है।
152 अपहरण के केस और एजेंसियों के गलत इस्तेमाल का दावा
निर्वाचन आयोग को सौंपे गए ज्ञापन में कांग्रेस ने पुलिस और प्रशासनिक तंत्र पर जमकर निशाना साधा है:
- अपहरण के मुकदमे: कांग्रेस ने दावा किया कि पार्षद चुनाव के नतीजे आने के बाद कांग्रेस और निर्दलीय पार्षदों तथा उनके परिजनों को डराने के लिए बड़ी संख्या में फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए हैं, अकेले 152 अपहरण के केस इसका प्रमाण हैं।
- सरकारी एजेंसियों का दबाव: आरोप लगाया गया कि जीएसटी, इनकम टैक्स, खाद्य और श्रम विभाग जैसी केंद्रीय व राज्य एजेंसियों का भय दिखाकर, पुराने नोटिस थमाकर और संपत्तियों की जाँच कराकर जीते हुए पार्षदों पर मानसिक दबाव बनाया जा रहा है।
कांग्रेस ने आयोग से मांग की है कि हालिया निकाय अध्यक्ष, सभापति और महापौर चुनावों की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जाँच कराई जाए। जहाँ-जहाँ भी पक्षपात या दबाव साबित हो, वहाँ परिणामों को रद्द कर पुनर्मतदान या पुनर्गणना की जाए।
एक तरफ चुनाव आयोग चुनावी तारीखों के अंतिम चरणों को कसने में लगा है, तो दूसरी तरफ चुनावी सुगबुगाहट के साथ ही आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर आने वाले दिनों में सियासी पारे को और ज्यादा चढ़ाने वाला है।



