आखिर ट्रैफिक जाम की मुश्किल से कब निजात पाएगी अवाम

    भारत के बड़े शहरों में ट्रैफिक जाम गंभीर समस्या बनता जा रहा है। बढ़ते वाहनों, कमजोर सार्वजनिक परिवहन, अवैध पार्किंग और नियमों की अनदेखी से हर साल भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता में जाम से लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है।

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    जयपुर। ट्रैफिक जाम देश की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। तमाम प्रयास के बाद भी यह कम नहीं हो रही। दिन-दूने रात-चौगुने बढ़ते वाहनों के बीच सड़क पर चलना मुश्किल हो चला है। ट्रैफिक को सुचारू करने के उपाय कम हो रहे हैं जबकि यातायात नियमों की अवहेलना के नाम पर जुमार्ना बढ़ता जा रहा है। बावजूद इसके नियमों की अवहेलना करने वालों की कमी नहीं है। हाल ही में एक रिपोर्ट ने और चौंका दिया।रिपोर्ट में बताया गया कि एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे महानगरों में ट्रैफिक जाम की वजह से हर साल लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपए का नुकसान होता है। केवल दिल्ली में ही अगर मौजूदा ट्रैफिक जाम को खत्म करने के लिए उपाय नहीं किए गए तो 2030 तक सालाना 14.6 अरब डॉलर का नुकसान होने का अंदेशा है। इसमें ईंधन से लेकर मैन पावर की बर्बादी भी शामिल है।

    शहर कोई भी हो हर जगह सड़कें वाहनों के बोझ से कराह रही हैं। सुबह-शाम ऑफिस समय में घंटों जाम, बढ़ता प्रदूषण, ईंधन की बर्बादी और मानसिक तनाव आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। हालत यह है कि लोग दूरी किलोमीटर में नहीं, बल्कि समय में नापने लगे हैं। विकास के दावे हो रहे हैं, लेकिन सड़क पर उतरते ही हकीकत जाम में फंसी दिखाई देती है। शहरों का विस्तार हुआ, वाहन तेजी से बढ़े, लेकिन परिवहन नीति वहीं की वहीं रही। हर साल नए वाहन सड़कों पर उतरते हैं, मगर न तो सड़कें बढ़ती हैं और न सार्वजनिक परिवहन उतना मजबूत होता है कि लोग निजी वाहन छोड़ें।

    अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कागजों में होती है, सड़क किनारे पार्किंग खुलेआम चलती है, और ट्रैफिक नियमों का पालन कराने वाली पुलिस अक्सर सिर्फ चालान काटने तक सीमित रहती हैं। फ्लाईओवर और अंडरपास बनते हैं, लेकिन योजना के अभाव में कुछ समय बाद वही जाम फिर लौट आता है। यानी समाधान स्थायी नहीं, अस्थायी और दिखावटी है। हर घर में कई वाहन, लेन अनुशासन की अनदेखी, जहां जगह मिली वहीं पार्किंग और छोटी दूरी के लिए भी बाइक-कार निकालने की आदत समस्या को और गंभीर बना रही है। आखिर इस बढ़ती समस्या का कोई हल तो सूझ होगा किसी को। विधायक-सांसद-मंत्री हो या सरकार, गिने-चुने खास इलाकों में इसको लेकर ध्यान देते हैं बाकी सब राम भरोसे। हां किसी वीआईपी का आना-जाना हो तो भले ही सामान्य वाहनों को घंटों रोक दिया जाए पर उन्हें कोई परेशानी न हो, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है।

    असल में ट्रैफिक समस्या का ठीक ढंग से निवारण हो ही नहीं रहा। नियम ताे ऐसे बनते हैं कि बस अब सबकुछ सही हो जाएगा पर होता नहीं है। कई साल पहले परिवहन विभाग समेत सरकार ने कहा था, कार खरीदने से पहले उसकी पार्किंग दिखानी होगी पर क्या हुआ, हर कोई कार खरीदता नजर तो आ जाता है पर खड़ी कहां करेगा, इसका सवाल सरकार नहीं करती। उस पर बढ़ती सड़क दुर्घटना कम करने की भी बातें खूब होती हैं पर होता कुछ नहीं। वास्तविकता यह भी है कि सरकारें सड़क चौड़ीकरण को ही समाधान मान बैठी हैं, जबकि दुनिया में कई शहरों ने निजी वाहनों पर नियंत्रण और मजबूत सार्वजनिक परिवहन से राहत पाई है। असल में शहरों का विस्तार हुआ, लेकिन सड़कें उसी अनुपात में नहीं बढ़ीं। लोग मजबूरी में निजी वाहन इस्तेमाल करते हैं क्योंकि बसें कम हैं, मेट्रो हर जगह नहीं पहुंची और साझा परिवहन सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं।

    अब वक्त आधे-अधूरे उपायों का नहीं, कठोर फैसलों का है। प्राइवेट गाड़ियों की बढ़ती संख्या इस जाम के लिए एक हद तक जिम्मेदार है। लेकिन, मूल वजह है पब्लिक ट्रांसपोर्ट के मुख्य साधन यानी बसों की लचर सर्विस। एक तो बसें कम हैं और दूसरे वे लेन सिस्टम नहीं होने के कारण निर्धारित रफ्तार से नहीं चल पातीं। यात्रियों को नहीं पता होता कि वे अपने डेस्टिनेशन पर कब तक पहुंचेंगे। अगर लेन सिस्टम बन जाए तो काफी हद तक बसें भी मेट्रो की तरह भरोसेमंद हो सकती हैं। लेकिन बसें बेरोकटोक अपनी लेन में चलें, इसके लिए कारगर उपाय करने पड़ेंगे। निजी वाहनों पर नियंत्रण, प्रभावी पार्किंग नीति, मजबूत बस नेटवर्क, सख्त ट्रैफिक अनुशासन और अतिक्रमण पर बिना समझौता कार्रवाई—यही रास्ता है। वरना जाम बढ़ता रहेगा और शहरों की रफ्तार थमती जाएगी। बसों की संख्या बढ़े, समयबद्ध सेवा हो और मेट्रो या रैपिड ट्रांजिट का विस्तार किया जाए। सड़क किनारे अवैध पार्किंग पर कड़ी कार्रवाई हो और मल्टीलेवल पार्किंग विकसित की जाए। फुटपाथ और सड़कों से कब्जे हटें, तभी यातायात सुचारू होगा।