जब सजा का होगा ‘प्रहार’, तब ही रुकेगा भ्रष्टाचार

    जल जीवन मिशन घोटाले में सुबोध अग्रवाल की गिरफ्तारी ने फिर दिखाया कि भ्रष्टाचार पर कार्रवाई अक्सर धीमी और अधूरी रहती है। जांच में देरी, अभियोजन स्वीकृति की कमी और कमजोर साक्ष्यों के कारण सजा कम होती है, जिससे भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ता है।

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    रिटायर्ड IAS अधिकारी सुबोध अग्रवाल आखिरकार पकड़े गए। जल जीवन मिशन में हुए हजारो करोड़ों के भ्रष्टाचार मामले में उनकी तलाश थी। पूर्व मंत्री महेश जोशी तक इस प्रकरण में जेल जा चुके हैं। ऐसा नहीं है कि यह किसी अफसर अथवा सरकारी संरक्षण में हुआ कोई पहला घोटाला है। पहले भी कई हुए, अफसर पकड़े भी गए पर देखा यही गया कि कुछ समय शोर मचा-एक्शन का ड्रामा किया गया, फिर सबकुछ शांत। घूस लेते धरे गए कर्मचारी हों या अफसर, कुछ दिन बाद फिर मलाईदार पोस्ट पर तैनात हो जाते हैं। विभाग अभियोजन की स्वीकृति ही नहीं देता। ऐसे अनगिनत मामले हैं, जिनमें कभी भ्रष्टाचार के मामले में फंसे कई अफसर अब बढ़िया पोस्ट पर तैनात हैं। जल जीवन मिशन घोटाले में अकेले सुबोध अग्रवाल ही हों, ऐसा नहीं है। कुछ अफसर पहले ही धरे जा चुके हैं। घोटाला बड़ा है पर एक्शन छोटा और धीमा। कई अधिकारी, इंजीनियर और निजी ठेकेदारों की मिलीभगत से टेंडर प्रक्रिया में फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया।

    असल में भ्रष्टाचार में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होती। सजा मिल नहीं रही, ऐसे में इसे अब सामान्य मान लिया गया है। एसीबी रोजाना कभी पटवारी तो कभी पुलिसकर्मी को घूस लेते पकड़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 300 मामले हर साल प्रदेशभर में घूसखोरी के पकड़े जा रहे हैं। रिकॉर्ड उठाकर देख लो तो अब तक गिने-चुने मामलों में ही सजा सुनाई गई है। अधिकतर विभाग संबंधित कार्मिक-अफसर के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति ही नहीं देते। मतलब साफ है कि विभाग ही नहीं चाहते कि घूसखोरों के खिलाफ कार्रवाई हो, उन्हें सजा मिले। यह बताता है कि भ्रष्टाचार अब सिस्टम का हिस्सा बन चुका है। सबसे बड़ी समस्या जांच प्रक्रिया की सुस्ती है। शुरुआती कार्रवाई तेज होती है, लेकिन बाद की जांच में ढिलाई आ जाती है। दस्तावेज जुटाने, बयान लेने और तकनीकी जांच में लंबा समय लग जाता है। इस देरी का सीधा फायदा आरोपी को मिलता है, क्योंकि अदालत में मजबूत साक्ष्य पेश नहीं हो पाते। नतीजा-जमानत और फिर लंबी कानूनी लड़ाई। विभागीय जांच लंबी चलती है, गिने-चुने मामले जो अदालतों में पहुंचते हैं वो भी वर्षों तक लंबित रहते हैं और सजा की संभावना कमजोर हो जाती है। इस स्थिति में ईमानदार व्यवस्था का मनोबल टूटता है और भ्रष्टाचारियों का हौसला बढ़ता है।

    सख्त कार्रवाई का मतलब केवल गिरफ्तारी नहीं, बल्कि परिणाम तक पहुंचना है। जब दोष सिद्ध होने पर नौकरी से बर्खास्तगी, सेवा लाभ रोकने और आर्थिक दंड जैसे कठोर कदम उठेंगे, तभी कानून का डर पैदा होगा। वरना कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी। यह भी जरूरी है कि भ्रष्टाचार के मामलों में समयबद्ध जांच हो। देरी ही सबसे बड़ी राहत बन जाती है। जितना मामला लंबा खिंचता है, उतना ही साक्ष्य कमजोर होते हैं और आरोपी को फायदा मिलता है। अगर जांच और सुनवाई तय समय में पूरी हो, तो संदेश साफ जाएगा कि भ्रष्टाचार का परिणाम तय है। रिश्वत मामलों में त्वरित विशेष अदालतें हों, दोष सिद्ध होने पर तत्काल सेवा से बर्खास्तगी हो। पेंशन और अन्य लाभों पर सख्त प्रावधान और संपत्ति को जब्त किया जाए। भ्रष्टाचार कोई छोटी समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था को खोखला करने वाली बीमारी है। इसे रोकने के लिए सख्त दवा ही जरूरी है। जब तक घूसखोरों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक सुधार की उम्मीद अधूरी ही रहेगी। कानून का डर ही व्यवस्था को मजबूत बनाता है और यह डर तभी पैदा होगा जब कार्रवाई दिखे भी और असरदार भी हो।