प्राइवेट स्कूलों की तानाशाही पर कब लगेगी लगाम ?

    अब समय आ गया है कि शिक्षा को सेवा की भावना से जोड़ते हुए स्पष्ट संदेश दिया जाए-मनमानी नहीं चलेगी। तभी अभिभावकों को राहत मिलेगी और शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा कायम रहेगा। केवल चमचमाती बिल्डिंग और दिखावटी व्यवस्था से अभिभावकों को राहत नहीं मिलने वाली। सरकार को खुद इस पर गंभीर होना होगा।

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    प्राइवेट स्कूलों की मनमानी नहीं रुक रही है। फीस वृद्धि का मामला हो या फिर जबरन ट्यूशन लगवाने का, अभिभावकों की मुश्किल कम नहीं हो रही। आए दिन स्कूलों की शिकायत जिम्मेदार अफसरों तक पहुंचती भी है पर एक्शन नहीं लिया जाता। सरकार की ओर से बरसों से चल रही कवायद का भी कोई असर नहीं दिखता। अपने बच्चों के भविष्य का सपना संजोने वाले अभिभावक स्कूलों की तानाशाही को सह रहे हैं। जयपुर समेत पूरे राजस्थान में प्राइवेट स्कूलों की फीस वृद्धि और अलग-अलग नियमों की शिकायतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। हर साल नया सत्र शुरू होते ही अभिभावकों के सामने फीस बढ़ोतरी, अनिवार्य किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन शुल्क और अन्य छिपे खर्चों की लंबी सूची थमा दी जाती है। शिक्षा, जो अधिकार होनी चाहिए, वह धीरे-धीरे महंगी सेवा में बदलती जा रही है। नियम तो स्पष्ट हैं कि प्राइवेट स्कूल मनमानी फीस नहीं बढ़ा सकते और फीस निर्धारण समितियों की निगरानी में निर्णय होना चाहिए। इसके बावजूद हकीकत यह है कि कई स्कूल इन नियमों को दरकिनार कर अपने हिसाब से शुल्क तय कर रहे हैं। कहीं “डेवलपमेंट फीस” के नाम पर वसूली, तो कहीं “एक्टिविटी चार्ज” के बहाने अतिरिक्त भार डाला जा रहा है। अभिभावक विरोध करते हैं तो बच्चों पर दबाव बनाने की शिकायतें भी सामने आती हैं। यह स्थिति चिंताजनक है।

    सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिकायत करने के बाद भी कार्रवाई धीमी रहती है। शिक्षा विभाग नोटिस जारी करता है, जांच बैठती है, लेकिन राहत मिलने में महीनों लग जाते हैं। तब तक नया सत्र खत्म होने को आ जाता है और अभिभावक मजबूरी में भुगतान कर देते हैं। सवाल यह है कि नियम होने के बावजूद उनका असर क्यों नहीं दिखता? जरूरत है कि फीस निर्धारण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बने। हर स्कूल को अपनी लागत, सुविधाओं और फीस का स्पष्ट विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। जिला स्तर पर सक्रिय निगरानी तंत्र हो, जहां अभिभावकों की शिकायतों का त्वरित निस्तारण तय समय सीमा में हो। साथ ही मनमानी फीस लेने वाले स्कूलों पर सख्त आर्थिक दंड और मान्यता पर कार्रवाई जैसे ठोस कदम जरूरी हैं। शिक्षा को व्यापार बनने से रोकना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन समाज की भी भूमिका कम नहीं। अभिभावकों की सामूहिक आवाज ही बदलाव ला सकती है। जब तक सख्ती नहीं होगी, तब तक हर साल यही कहानी दोहराई जाती रहेगी, फीस बढ़ेगी, अभिभावक परेशान होंगे और व्यवस्था मौन रहेगी।

    यूं तो सरकार ने निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण के लिए सरकार ने समय-समय पर कई कदम उठाए, लेकिन जमीन पर अपेक्षित असर नहीं दिखा। यही कारण है कि अभिभावकों की परेशानी लगातार बनी हुई है। निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए फीस निर्धारण को नियमन के दायरे में लाया गया और तय किया गया कि बिना प्रक्रिया अपनाए फीस नहीं बढ़ाई जा सकती। अभिभावकों के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए फीस तय करने के लिए समितियों का गठन किया गया, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। विवाद होने पर अभिभावक जिला स्तर की कमेटी में शिकायत कर सकें, यह व्यवस्था बनाई गई। शिक्षा विभाग के आदेश: हर साल फीस वृद्धि पर सीमा और औचित्य बताने के निर्देश जारी किए गए। अभिभावकों की शिकायत दर्ज करने के लिए डिजिटल माध्यम उपलब्ध कराया गया। बावजूद इसके सुधार क्यों नहीं हुआ, वर्तमान में राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवारी साल 2004 में शिक्षा मंत्री थे, तब ही बहुत कुछ सुधारने का संकल्प लिया गया था पर हुआ कुछ नहीं। बाद में सरकारें आती रहीं, शिक्षा मंत्री भी पर प्राइवेट स्कूलों की तानाशाही को रोकने के प्रयास ही ठीक ढंग से नहीं किए गए। लाखों पेरेंट्स की परेशानी को समझने की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि शिक्षा को सेवा की भावना से जोड़ते हुए स्पष्ट संदेश दिया जाए-मनमानी नहीं चलेगी। तभी अभिभावकों को राहत मिलेगी और शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा कायम रहेगा। केवल चमचमाती बिल्डिंग और दिखावटी व्यवस्था से अभिभावकों को राहत नहीं मिलने वाली। सरकार को खुद इस पर गंभीर होना होगा।

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