कम होती हरियाली पर भी जागे सरकार

    शहरों में विकास के नाम पर हरियाली लगातार घट रही है, जबकि पौधरोपण केवल दिखावा बनकर रह गया है। लाखों पौधे लगाने के दावे होते हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में वे जीवित नहीं रह पाते। भ्रष्टाचार, लापरवाही और जिम्मेदारी तय न होने से स्थिति बिगड़ रही है।

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    गर्मी आ गई, धूप बढ़ने लगी। दूर तक पेड़ नजर नहीं आ रहे, छाया मिलना मुश्किल होता जा रहा है। विकास की राह पर बढ़ रहे शहरों में हरियाली कम होती जा रही है। मानसून आते ही फिर पौधरोपण का सिलसिला शुरू हो जाएगा। सरकार इसके लिए अभियान चलाएगी और संगठन-संस्थाएं ही नहीं कई समाजसेवी इसमें शामिल भी होंगे। यह हर साल होता है, आंकड़े भी आते हैं, आमजन को बताया जाता है कि इस बार इतने पौधे लगा दिए गए हैं। अब हरियाली ही हरियाली दिखेगी। यह उसी सपने की तरह है जो अक्सर टूट जाता है। राजधानी जयपुर समेत प्रदेश के बड़े शहरों को देख लें तो कमोबेश यही दिखाई देता है। मुख्य चौराहे-सड़क ही नहीं अनेक ऐतिहासिक स्थलों से हरियाली धीरे-धीरे यह समाप्त हो रही है। चाहे सड़क निर्माण हो या अन्य विकास कार्य, जिस हिसाब से पेड़ कट रहे हैं, उससे पर्यावरण पर खतरा मंडरा रहा है। जयपुर में परकोटे के भीतर की बात करें या बाहर की, पेड़ काटे जा रहे हैं। इस अवैध कटाई को रोकने के तमाम इंतजाम फेल साबित हो रहे हैं। हरियाली का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है। यह चिंता सिर्फ राजधानी जयपुर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की हकीकत बनती जा रही है।

    हर साल लाखों पौधे लगाने के दावे होते हैं, फोटो खिंचते हैं, अभियान चलते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद वही पौधे सूख जाते हैं। सवाल यह है कि जब पौधरोपण हो रहा है तो पेड़ क्यों नहीं बन पा रहे? असल समस्या पौधे लगाने की नहीं, उन्हें बचाने की है। पौधरोपण को एक औपचारिक कार्यक्रम बनाकर छोड़ दिया जाता है। न तो नियमित सिंचाई की व्यवस्था होती है, न सुरक्षा के इंतजाम। कई जगह पशु पौधों को नुकसान पहुंचा देते हैं, तो कहीं पानी के अभाव में पौधे दम तोड़ देते हैं। सरकारी रिकॉर्ड में पौधे जीवित रहते हैं, लेकिन जमीन पर वे गायब हो जाते हैं। हर साल मानसून के दौरान बड़े-बड़े लक्ष्य तय किए जाते हैं, लेकिन इन लक्ष्यों की गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। हरियाली बढ़ाने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर न हरियाली बढ़ती है और न ही लगाए गए पौधे पेड़ बन पाते हैं। यह स्थिति सिर्फ लापरवाही का नतीजा नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम की ओर इशारा करती है जिसमें पौधरोपण अभियान भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता नजर आता है। कागजों में लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में कई जगह गड्ढे तक नहीं खोदे जाते। कहीं पौधे लगाए भी जाते हैं तो उनकी संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखा दी जाती है। पौधों की खरीद, परिवहन, मजदूरी और देखरेख के नाम पर बजट खर्च होता है, मगर न तो गुणवत्ता की जांच होती है और न ही यह देखा जाता है कि पौधे जीवित हैं या नहीं। इस तरह हरियाली के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग होता रहता है।

    पौधरोपण अभियान के दौरान अधिकारी और जनप्रतिनिधि फोटो खिंचवाकर चले जाते हैं, लेकिन उसके बाद कोई देखने नहीं आता कि पौधे बचे भी हैं या नहीं। कई मामलों में एक ही स्थान को बार-बार पौधरोपण का स्थल दिखाकर रिकॉर्ड में संख्या बढ़ा दी जाती है। यह दिखावटी अभियान पर्यावरण के बजाय आंकड़ों को हरा-भरा करने का माध्यम बन जाता है। आखिर इस दिखावे से बचने की आवश्यकता है। पौधों का चयन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नहीं होता। रेगिस्तानी और शुष्क क्षेत्र में भी ऐसे पौधे लगा दिए जाते हैं जिन्हें ज्यादा पानी चाहिए। परिणाम साफ है-कुछ ही समय में पौधे सूख जाते हैं और हरियाली का सपना अधूरा रह जाता है। पौधरोपण के बाद यह तय ही नहीं होता कि लगाए गए पौधों की देखरेख कौन करेगा। विभाग बदलते रहते हैं, जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं होती। यदि किसी अधिकारी या संस्था को पौधे जीवित रखने की जिम्मेदारी तय की जाए और उसकी नियमित मॉनिटरिंग हो, तो हालात बदल सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में भी हरियाली तेजी से घट रही है। विकास परियोजनाओं के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन उनके बदले लगाए गए पौधों की निगरानी नहीं होती। सड़क चौड़ीकरण, कॉलोनियों का विस्तार और कंक्रीट का फैलाव पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ रहा है। शहरों में तापमान बढ़ रहा है, वायु गुणवत्ता खराब हो रही है, और इसका सीधा असर आमजन के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जरूरत इस बात की है कि पौधरोपण को अभियान नहीं, दीर्घकालिक योजना बनाया जाए। स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए जाएं, पानी और सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था हो, और कम से कम तीन साल तक निगरानी अनिवार्य की जाए। स्कूलों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों को भी जिम्मेदारी दी जाए ताकि लगाए गए पौधे वास्तव में पेड़ बन सकें।