खामियां दूर हों ताकि सरकारी योजना का लाभ मिले भरपूर

    RGHS योजना का उद्देश्य कैशलेस इलाज देना है, लेकिन भुगतान में देरी, जटिल प्रक्रिया और फर्जी बिलिंग जैसी खामियों से यह विवादों में है। निजी अस्पतालों और सरकार के बीच तालमेल की कमी से मरीजों को परेशानी हो रही है। समाधान के लिए समयबद्ध भुगतान, सख्त निगरानी, सरल प्रक्रिया, मजबूत तकनीकी सिस्टम और पारदर्शिता जरूरी है, ताकि योजना का वास्तविक लाभ आमजन तक पहुंच सके।

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    RGHS (राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम) में गड़बड़ी के आरोप में गिरफ्तार डॉक्टर सोनदेव बंसल के समर्थन में प्राइवेट अस्पतालों ने सेवाएं बंद रखने का आह्वान किया। आईएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) की ओर से किए गए बंद के साथ आरजीएचएस सेवा को भी स्थगित करने का निर्णय लिया गया है। डॉक्टर की गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताते हुए तुरंत रिहाई की मांग की गई है। मतलब डॉक्टर का कोई दोष नहीं था, उसके खिलाफ जो भी एक्शन हुआ वो गलत है। पहले ही मनमानी फीस वसूली के लिए निजी अस्पताल बदनाम हैं, ऐसे में आरजीएचएस में भी गड़बड़ी हो तो फिर चिकित्सीय प्रोफेशन पर सवाल तो खड़े होंगे ही। जयपुर की मानसरोवर थाना पुलिस ने निविक हॉस्पिटल के संचालक डॉ. सोमदेव बंसल को रविवार को गिरफ्तार किया। अस्पताल में भर्ती मरीज के दस्तावेज में कांट-छांट करके आरजीएचएस की सरकारी वेबसाइट पर अपलोड करने के मामले में आरोपी डॉ. सोमदेव को गिरफ्तार किया। संबंधित विभाग ने भी इस गड़बड़ी के संबंध में शिकायत की थी। अनुसंधान में सामने आया कि अस्पताल प्रशासन ने आरजीएचएस दस्तावेज में जानबूझकर सरकारी पोर्टल पर गलत जानकारी अपलोड की थी। वकीलों ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ लापरवाही का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया था, तब पुलिस ने कार्रवाई नहीं की थी।

    RGHS का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स को कैशलेस इलाज देना था, लेकिन राजस्थान में यह योजना लगातार गड़बड़ियों के कारण विवादों में है। सबसे बड़ी वजह भुगतान में देरी मानी जा रही है। निजी अस्पतालों का कहना है कि महीनों तक बिलों का भुगतान नहीं होता, जिससे उनका आर्थिक संतुलन बिगड़ता है। इसके चलते कई अस्पताल योजना के मरीजों को भर्ती करने से बचते हैं या अतिरिक्त राशि मांगने लगते हैं। इससे लाभार्थियों को परेशानी झेलनी पड़ती है। इलाज की मंजूरी, पैकेज दरें और दस्तावेजी प्रक्रिया इतनी उलझी हुई है कि अस्पताल और मरीज दोनों भ्रमित रहते हैं। कई बार इसी अस्पष्टता का फायदा उठाकर गड़बड़ी की गुंजाइश बन जाती है। यह पहला मामला नहीं है, पहले भी कई बार फर्जी बिलिंग की शिकायत सामने आई है। मामूली से रोग पर बड़ा बिल बनाकर चांदी काटना कई अस्पतालों का धंधा बन चुका है। समय-समय पर शिकायतें भी मिलती रहीं पर न सरकार ने अपना रवैया सुधारा न अस्पतालों ने। सरकार समय पर पेमेंट नहीं करती, कई अस्पतालों का बकाया करोड़ों पहुंच जाता है। इस वजह से अधिकांश बड़े अस्पतालों ने इस योजना से दूरी बना ली है। मजे की बात यह है कि सरकार के बार-बार कहने के बावजूद ये अस्पताल सरकार की इस योजना को ही नहीं मान रहे। सरकार खुद भी इसे लागू करवाने के लिए कठोर कदम नहीं उठा रही।

    इस योजना का मकसद यह है कि सरकारी कर्मचारियों के साथ उनके परिजनों, पेंशनर्स को इलाज के लिए जेब से बड़ी रकम न खर्च करनी पड़े और उन्हें बेहतर निजी अस्पतालों में भी सुविधा मिल सके। कई जिलों में सूचीबद्ध अस्पतालों की संख्या कम है। मरीजों को दूर जाना पड़ता है, जिससे योजना का लाभ कम हो जाता है। कई बार अस्पताल कैशलेस इलाज देने से मना कर देते हैं या पहले नकद जमा कराने को कहते हैं, जबकि योजना का उद्देश्य ही कैशलेस सुविधा है। इलाज की मंजूरी, दस्तावेज और पैकेज दरों से जुड़ी प्रक्रिया जटिल है। इससे मरीज और अस्पताल दोनों परेशान रहते हैं। फर्जी बिलिंग, अनावश्यक जांच या इलाज जैसे आरोप सामने आते हैं। नियमित ऑडिट और सख्त कार्रवाई का अभाव गड़बड़ियों को बढ़ाता है। भुगतान प्रक्रिया समयबद्ध हो, बिलों की जांच स्पष्ट हो और किसी भी गड़बड़ी पर तुरंत कार्रवाई हो। साथ ही, योजना के पोर्टल और तकनीकी ढांचे को मजबूत किया जाए, ताकि इलाज की मंजूरी में देरी न हो। सरकार को अस्पतालों के साथ नियमित संवाद भी बनाए रखना होगा। यदि समस्याओं को समय रहते सुना और हल किया जाए तो विवाद की नौबत नहीं आएगी। वहीं लाभार्थियों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र भी जरूरी है, ताकि उन्हें भटकना न पड़े। यह समझना होगा कि स्वास्थ्य योजनाएं भरोसे पर चलती हैं। यदि व्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो न अस्पताल संतुष्ट होंगे और न ही लाभार्थी। इसलिए समय की मांग है कि राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम में व्यापक सुधार कर इसे वास्तव में जनहितकारी बनाया जाए। हां, गड़बड़ी करने वाले डॉक्टर-अस्पताल के खिलाफ कानूनी एक्शन हो, इसके लिए कोई भी दबाव बनाए, सरकार को नहीं झुकना चाहिए।