शिक्षा विभाग सार्थक नामों का बैंक तैयार कर रहा है। पहल अच्छी है, सरकारी स्कूलों में बच्चे अपने अटपटे नाम बदल सकेंगे। सरकार ने ऐलान किया है कि वो नए नाम देगी। नाम वही दिए जाएंगे जिनका अर्थ हो। राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने भी सही कहा, नाम से ही छवि बनती है। निरर्थक नाम कई बार उसकी शर्मिंदगी का कारण बन जाते हैं। यह बात इसलिए भी सही होती है कि कई बाबूलाल/ भगवानलाल बीएल हो गए और कई रामलाल आरएल और ग्यारसी लाल जीएल के नाम से जाने जाते हैं। सरकारी स्कूलों से शुरू हो रही यह कवायद आगे कहां जाएगी, इसका तो नहीं मालूम पर नाम सही रखे जाने से स्कूलों का स्तर कितना सुधरेगा, यह सवाल अब पूछा जाने लगा है। यह भी सबको मालूम है कि सरकारी स्कूलों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। शिक्षकों की कमी तो बरसों से बनी हुई है, जर्जर इमारतें भी ठीक ढंग से सुधारी नहीं जा रही। पढ़ाई का स्तर कितना बढ़िया है, यह हाल ही के परिणामों से पता चलता है।
शिक्षा सुधारने के लिए भी तो बदलाव की आवश्यकता है। सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं, लेकिन सुधार की दिशा में ठोस कदम अभी भी अधूरे हैं। योजनाओं और घोषणाओं की कमी नहीं, पर जमीन पर असर सीमित दिखाई देता है। ऐसे में अब समय आ गया है कि सरकार सतही बदलावों से आगे बढ़कर वास्तविक सुधारों पर ध्यान दे। सबसे पहली जरूरत शिक्षकों की कमी दूर करने की है। कई स्कूल ऐसे हैं जहां एक या दो शिक्षक पूरी प्राथमिक से लेकर उच्च कक्षाओं तक पढ़ाने को मजबूर हैं। इस स्थिति में गुणवत्ता की उम्मीद करना मुश्किल है। नियमित भर्ती, विषयवार शिक्षक और समय पर पदस्थापन ही पढ़ाई का स्तर सुधार सकते हैं। कई स्कूलों में आज भी पर्याप्त कक्षाएं नहीं, शौचालय अधूरे, पीने के पानी की व्यवस्था कमजोर और प्रयोगशालाएं नाममात्र की हैं। बच्चों को बेहतर माहौल मिलेगा तभी वे स्कूल से जुड़ाव महसूस करेंगे। शिक्षा का स्तर भवन और संसाधनों से भी जुड़ा होता है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नामांकन बढ़ाने की बजाय यह देखना जरूरी है कि बच्चे वास्तव में क्या सीख रहे हैं। नियमित मूल्यांकन, कमजोर छात्रों के लिए विशेष कक्षाएं और शिक्षकों की जवाबदेही तय करना जरूरी है। बिना गुणवत्ता के आंकड़ों का कोई मतलब नहीं। डिजिटल शिक्षा को भी मजबूत करना होगा। स्मार्ट क्लास, इंटरनेट और आधुनिक शिक्षण सामग्री से सरकारी स्कूल निजी स्कूलों से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। इसके साथ ही स्कूल प्रबंधन में पारदर्शिता और स्थानीय भागीदारी बढ़ाना भी जरूरी है। अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी से निगरानी मजबूत होगी और स्कूलों की जिम्मेदारी तय होगी। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं। अगर इन्हीं स्कूलों की गुणवत्ता कमजोर रहेगी, तो सामाजिक असमानता और बढ़ेगी। नामों की पहल को कोई गलत नहीं बता रहा पर सरकारी स्कूलों का स्तर सुधरे, इसके लिए तो सरकार को आगे आना होगा। दसवीं-बारहवीं बोर्ड परीक्षा के रिजल्ट समय से पहले जारी करने की वाहवाही लूटी जा रही है तो सरकारी स्कूलों की बिल्डिंग के साथ शिक्षकों की कमी को दूर करने का काम प्राथिमकता से होना चाहिए। लाखों बच्चों के भविष्य का सवाल है।



