आधी आबादी की बढ़ती भागीदारी क्या सुधार पाएगी महिलाओं की स्थिति

    महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ना सकारात्मक कदम है, लेकिन केवल सीटें बढ़ाने से उनकी स्थिति पूरी तरह नहीं सुधरेगी। शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक सोच में बदलाव जरूरी है। जब तक नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन और मानसिकता में बदलाव नहीं होगा, तब तक वास्तविक महिला सशक्तिकरण अधूरा ही रहेगा।

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    देशभर में नारी शक्ति वंदन कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसे लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी का नया युग बताया जा रहा है। वैसे महिलाओं को आगे बढ़ने का दावा देश का हर राजनीतिक दल कर रहा है, बावजूद जमीनी स्तर पर हकीकत कुछ और ही है। महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण का हल्ला कई बरसों से मच रहा है पर वास्तविकता यह है कि लोकसभा-विधानसभा में दस-बारह फीसदी से अधिक महिला उम्मीदवारों को टिकट ही नहीं दी जाती। यही हाल अन्य जगह पर है वो चाहें सामाजिक संगठन हो या धार्मिक। महिलाओं के लिए राजनीतिक सीटों में बढ़ोतरी को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही है। इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाने का उद्देश्य यह है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़े और नीतियों में महिलाओं से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता मिले। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल सीटें बढ़ जाने से देशभर की महिलाओं की स्थिति में वास्तविक सुधार हो जाएगा। जब अधिक महिलाएं सत्ता और नीति निर्माण का हिस्सा बनेंगी, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर उनकी आवाज अधिक प्रभावी ढंग से उठेगी।

    यह सच है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से उनके मुद्दों को अधिक महत्व मिल सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार जैसे विषयों पर महिलाओं की दृष्टि अलग होती है, जो नीतियों को अधिक संवेदनशील बना सकती है। इसलिए प्रतिनिधित्व बढ़ाना जरूरी कदम है और इससे सकारात्मक संकेत भी जाता है कि समाज महिलाओं को नेतृत्व में स्वीकार कर रहा है। यह भी स्पष्ट है कि महिलाओं की स्थिति बहुआयामी समस्याओं से जुड़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी, रोजगार के सीमित अवसर, सामाजिक बंधन और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं अभी भी बड़ी चुनौती हैं। जब तक इन मुद्दों पर ठोस सुधार नहीं होगा, तब तक केवल राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने से व्यापक बदलाव की उम्मीद फिलहाल जल्दबाजी होगी। देश में महिलाओं की स्थिति को लेकर समय-समय पर बड़े दावे किए जाते हैं। कहा जाता है कि महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, उन्हें बराबरी का अधिकार मिल रहा है और सशक्तिकरण की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो तस्वीर उतनी संतोषजनक नहीं दिखती। शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान जैसे कई मोर्चों पर महिलाएं अब भी चुनौतियों से जूझ रही हैं। सबसे बड़ी चिंता महिलाओं की सुरक्षा को लेकर है। आए दिन सामने आने वाली घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सार्वजनिक स्थानों से लेकर घर तक महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। कानून सख्त होने के बावजूद अपराधों में कमी नहीं आ रही। यह स्थिति बताती है कि केवल नियम बनाने से समस्या हल नहीं होती, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की भी उतनी ही जरूरत है।

    शिक्षा के क्षेत्र में भी असमानता बनी हुई है। शहरों में भले ही बेटियां आगे बढ़ रही हों, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी कई लड़कियां उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती हैं। सामाजिक दबाव, आर्थिक कमजोरी और जल्दी विवाह जैसी समस्याएं उनके सपनों को सीमित कर देती हैं। शिक्षा की कमी महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण को सीधे प्रभावित करती है। रोजगार के मोर्चे पर भी स्थिति बहुत उत्साहजनक नहीं है। महिलाओं की श्रम भागीदारी दर अभी भी अपेक्षाकृत कम है। कई योग्य महिलाएं अवसरों की कमी या पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कार्यक्षेत्र से दूर रह जाती हैं। कार्यस्थलों पर असमान वेतन और सीमित नेतृत्व अवसर भी उनकी प्रगति में बाधा बनते हैं। सामाजिक स्तर पर भी सोच में बदलाव की गति धीमी है। कई जगहों पर आज भी महिलाओं के निर्णय लेने की क्षमता को कमतर आंका जाता है। घर और समाज में बराबरी का व्यवहार न मिलना उनके आत्मविश्वास को प्रभावित करता है। जब तक मानसिकता में बदलाव नहीं होगा, तब तक नीतियों का असर सीमित ही रहेगा। देश के गांवों में पल रही बेटियों के साथ महिलाओं की स्थिति भी सुधारने के लिए प्रयास होने चाहिएं वरना संख्या में महिलाएं अधिक होने के बाद भी आधी आबादी के हाल में कोई खास सुधार नहीं आने वाला।