कड़ी कार्रवाई के बिना नहीं थमेगी घूसखोरी

    भ्रष्टाचार पर अंकुश तभी लगेगा, जब गिरफ्तारी के बाद सजा भी निश्चित और समयबद्ध हो। केवल पकड़ने से नहीं, बल्कि दोषियों को उदाहरण बनाने से ही सिस्टम में सुधार आएगा। वरना घूसखोरी की खबरें आती रहेंगी और कुछ दिन बाद रिहाई की कहानी दोहराई जाती रहेगी।

    0
    110

    एक एसडीएम ने फिर बड़ा कारनामा कर डाला। करौली जिले के नादौती उपखण्ड में एसडीएम समेत 3 कार्मिक साठ हजार रुपए की घूस लेते पकड़े गए। एसीबी की इस कार्रवाई को फिलहाल सभी लोग शानदार बता रहे हैं। हालांकि कुछ दिन बाद सबकुछ सामान्य हो जाएगा, जमानत होगी और ये सब फिर से अपने काम में जुट जाएंगे। इनके पास से 4 लाख की संदिग्ध राशि भी इनसे बरामद की गई। सुनने में आया है कि आरोपी एसडीएम काजल मीना का अभी प्रोबेशन पीरियड भी पूरा नहीं हुआ। ऐसा नहीं कि ये पहली एसडीएम हैं जो रिश्वत काण्ड में पकड़ी गई हैं, इससे पहले भी कई एसडीएम पकड़े गए। कुछ दिन पहले जल जीवन मिशन से जुड़े कथित 960 करोड़ रुपये के घोटाले में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल को भी गिरफ्तार किया गया है। ऐसे दर्जनों अफसरों की लंबी फेहरिस्त है जो घूस लेते पकड़े गए पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई।

    उपखंड स्तर पर एसडीएम जनता और शासन के बीच सबसे अहम कड़ी होता है। जमीन विवाद, राजस्व मामलों, लाइसेंस, प्रशासनिक आदेश-हर जगह उसकी भूमिका निर्णायक होती है। ऐसे पद पर बैठे अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगना आम नागरिक के भरोसे को झकझोर देता है। पिछले कुछ वर्षों में बार-बार एसडीएम स्तर के अधिकारी एसीबी के जाल में फंसते रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या सिर्फ ट्रैप कार्रवाई ही समाधान है? जब एक अधिकारी पकड़ा जाता है तो कुछ समय बाद दूसरा मामला सामने आ जाता है। इसका मतलब है कि निगरानी, जवाबदेही और दंड की व्यवस्था प्रभावी नहीं है। जमीन का नामांतरण, खसरा-गिरदावरी, निर्माण अनुमति-हर काम में देरी और फिर “सुविधा शुल्क” की मांग आम शिकायत बन चुकी है। जनता के लिए यह व्यवस्था भय और मजबूरी का कारण बनती जा रही है।

    सबसे चिंताजनक बात यह है कि कार्रवाई के बाद भी लंबे समय तक मुकदमे चलते रहते हैं। कई मामलों में निलंबन के बाद बहाली हो जाती है, विभागीय जांच वर्षों तक लटकी रहती है और दोष तय होने तक अधिकारी सेवा में बने रहते हैं। सजा की धीमी प्रक्रिया भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की धार को कुंद कर देती है। जब उदाहरण नहीं बनते, तो गलत प्रवृत्तियों पर रोक लगना भी मुश्किल हो जाता है। भ्रष्टाचार का दायरा बढ़ने का एक कारण यह भी है कि संवेदनशील पदों पर लंबे समय तक तैनाती, कमजोर निगरानी और जवाबदेही की कमी बनी रहती है। ट्रैप कार्रवाई से केवल एक घटना सामने आती है, लेकिन व्यवस्था में सुधार के बिना समस्या जड़ से खत्म नहीं होती। भ्रष्टाचार पर अंकुश तभी लगेगा, जब गिरफ्तारी के बाद सजा भी निश्चित और समयबद्ध हो। केवल पकड़ने से नहीं, बल्कि दोषियों को उदाहरण बनाने से ही सिस्टम में सुधार आएगा। वरना घूसखोरी की खबरें आती रहेंगी और कुछ दिन बाद रिहाई की कहानी दोहराई जाती रहेगी। घूस लेने पर कानून कड़े बनें, केवल निलंबन से कुछ नहीं होने वाला, बर्खास्तगी हो। जब तक डर नहीं होगा तब तक घूसखोरी पर लगाम नहीं लगेगी।